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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३४ विशेषार्थ – शरीर ५, बन्धन ५, संघात ५, संस्थान ६, अङ्गोपाङ्ग ३, संहनन ६, वर्ण ५, | गन्ध २, रस ५, स्पर्श ८ ये ५० तथा निर्माण-आतप-उद्योत-स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, प्रत्येकशरीर, साधारणशरीर, अगुरुलघु, उपघात और परघात ये सर्व ६२ प्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी हैं, क्योंकि पुद्गल (शरीर) में ही इनका फल पड़ता है, जैसे शरीरनामकर्म के उदय से पुद्गल शरीररूप परिणमन करता हा ... ..... ....... ... ... :: .. .. ... ... . आगे भवविपाकी-क्षेत्रबिपाकी एवं जीवविपाकी प्रकृतियों को कहते हैं - आऊणि भवविवाई खेत्तविवाई य आणुपुव्वीओ। अठ्ठत्तरि अवसेसा जीवविवाई मुणेयव्वा ॥४८॥ अर्थ - चारों आयु भवविपाकी तथा चारों आनुपूर्वी क्षेत्रविपाकी हैं। इनका उदय विग्रहगति में ही होता है। जीवविपाकी प्रकृतियाँ ७८ हैं, क्योंकि जो जीव की नरकादि पर्याय को उत्पन्न कराने में कारण हैं वे जीवविपाकी कहलाती हैं। अब जीवविपाकीप्रकृतियों के नाम कहते हैं - वेदणियगोदघादीणेकावण्णं तु णामपयडीणं । सत्तावीसं चेदे अट्टत्तरि जीवविवाई ॥४९॥ अर्थ - वेदनीय की दो, गोत्र की दो, घातियाकर्म की ४७ (ये ५१ प्रकृतियाँ और), नामकर्म की २७ ये सर्व ७८ प्रकृतियाँ जीवविपाकी हैं। विशेषार्थ - वेदनीयकर्म पुद्गलविपाकी भी है, क्योंकि वह बाह्यसामग्री मिलाता है। "जीवपोग्गल विषाइत्तं सादावेदणीयस्स पावेदि तिचे ण, इट्टत्तादो" यदि कहा जावे कि सातावेदनीयकर्म को जीवविपाकी और पुद्गलविपाकीपना प्राप्त होता है, सो भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह तो इष्ट जीवविपाकी प्रकृतियों में कही गई नामकर्म की २७ प्रकृतियों को कहते हैं - तित्थयरं उस्सासं बादरपज्जत्तसुस्सरादेजं । जसतसविहायसुभगदु चउगइ पणजाइ सगवीसं ॥५०॥ अर्थ - तीर्थंकर, उच्छ्वास, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय, ! १. ध. पु. ६ पृ. ३६।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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