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________________ सार्व (<) द्वारा | हिन्दीटीका होकर परम पूज्य आचार्यकल्प श्री श्रुतसागरजी महाराजके आशीर्वादले उसका प्रकाशन आचार्य श्री शिवसागर दि. जैन ग्रन्थमाला, श्री शांतिवीरनगर से हो चुका है तब त्रिलोकलारग्रन्थका कार्य करनेके विचारोंको स्थगित किया गया। इस सबके कुछ दिन कि कुछ दिन पश्चात माताजीकी प्रेरणा मिली कि "आदिमतीजी ! त्रिलोकसारका कार्य तो हो चुका। अब तुम्हें गोम्मटसारकर्मकाण्डका कार्य प्रारम्भ करना है।" इस प्रेरणात्मक आदेशके साथ ही मार्गदर्शन भी मिला कि संस्कृतटीका एवं मूलमें दी गई संदृष्टियांसहित आवश्यकता पड़नेपर पं. टोडरमलजी कृत टीका का आधार लेते हुए गोम्मटसारकर्मकाण्डकी ही मराठी टीकासे संदृष्टियोंको यथास्थान समायोजित करके शुद्ध हिन्दीमें नवीन अनुवाद करना है। इस महत्कार्यको करनेमें माताजी स्वयं सक्षम थीं, क्योंकि वे न्याय, व्याकरण, साहित्य, अध्यात्म एवं सिद्धान्तविषयों की मर्मज्ञा हैं। उन्होंने कष्टसही कहे जानेवाले अष्टसहस्री जैसे न्यायग्रन्थ, कातन्त्रव जैनेन्द्रप्रक्रिया सदृश व्याकरणग्रन्थ, अध्यात्मसम्बन्धी नियमसार तथा करणानुयोगी आस्रवत्रिभंगी व भावत्रिभंगी आदि ग्रन्थों का अनुवाद किया है और न्यायकुमुदचन्द्रादि अनेकग्रन्थों का अनुवाद कार्य प्रारम्भ है। स्वतंत्ररूपसे भी न्यायसार, त्रिलोकभास्करादि विविध विषयोंके प्रतिपादक विभिन्न ग्रन्थों का सृजन भी किया है। स्तुति रचना भी आपका प्रियविषय रहा है अतः समाधिशतक, इष्टोपदेश, द्रव्यसंग्रहादि ग्रन्थों का पद्यानुवाद एवं स्वतन्त्ररूपेण आपके अनेक स्तवन भी प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी वक्तृत्वकला का भी समाजमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। चुम्बकीय आकर्षणयुक्त आपकी मृदुबाणी कल्याणेच्छु भव्यप्राणीको सहज ही प्रेरित करती है । फलस्वरूप अनेक भव्यप्राणियों ने आपसे प्रेरणा प्राप्तकर आचार्य श्री शिवसागरजी एवं आचार्य श्री धर्मसागरजी महाराज मुनि आर्थिकादि दीक्षाएँ ग्रहणकर आत्मसाधनाका मार्ग प्रशस्त किया है। माताजीने अपने निकटस्थ लोगोंको जैनदर्शनका सर्वाङ्गीण अध्ययन स्वयं कराया है। फलस्वरूप आर्यिका जिनमतीजी भी विदुषी आर्यिका हैं, उन्होंने भी आपकी ही प्रेरणा प्राप्तकर 'प्रमेयकमलमार्तण्ड' का अनुवाद किया है। इन्हीं आर्यिकाद्वय (ज्ञानमतीजी एवं जिनमतीजी) के सान्निध्य में मुझे जैनदर्शनके विभिन्न विषयोंका अध्ययन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। तव परमविदुषी ज्ञानमती माताजीके मुझपर अनन्त उपकार हैं, क्योंकि अल्पावस्थामें ही वैधव्य जीवन प्राप्त हो जानेपर आत्मसाधनाके मार्गपर अग्रसर होनेके लिए हस्तावलंबन स्वरूप जिन मातृवत्सला, अभीक्ष्णज्ञानोपयोगी, हितमित मृदु उपदेष्ट्री आर्यिकाकी खोज थी, उसकी सम्पूर्ति माताजी के मिलनेपर हो गई। माताजी के सर्वप्रथम दर्शन करके ऐसा लगा कि चिरकालसे वियुक्त जननी ही मिल गई हो। आप बालब्रह्मचारिणी हैं। आपकी ही असीम प्रेरणा से प्रेरित होकर सन् १९६१ में सीकर (राज.) में परम पूज्य प्रातः स्मरणीय चारित्रशिरोमणि वात्सल्यहृदय गुरुवर्य आचार्य श्री १०८ शिवसागरजी महाराजसे स्त्रियोचित उत्कृष्टसंयमरूप आर्यिका दीक्षा ग्रहण करनेका मुझे सुमंगलाबसर प्राप्त हुआ। जैसा मैंने पहले लिखा है कि इस महत्कार्य को सम्पन्न करनेमें माताजी स्वयं सक्षम थीं तथापि उनके जीवनकी यह सबसे बड़ी विशेषता है कि उन्होंने अपने निकटस्थ रहनेवाले लोगों की भी सर्वांगीण उन्नति की कामना की है। यही कारण था कि ज्ञानाराधनामें कभी भी उन्होंने किसी को पीछे नहीं रखा। इसी उदारता के
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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