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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६४४ है; अरगुणस्थान बना देगसिपुत कृतिका एवं उदय २१-२६-२८-२९ व ३० प्रकृतिरूप है, देशसंयतगुणस्थानमें बन्ध देवगतिसंयुक्त २८ प्रकृतिका और उदय ३० प्रकृतिका है, प्रमत्तगुणस्थानमें बन्ध देवगतियुत २८ तथा उदय २५-२७-२८-२९ व ३० प्रकृतिका है, अप्रमत्तअपूर्वकरणगुणस्थानमें देवतियुत बन्ध २८ का एवं देव-आहारकयुत ३० प्रकृतिका व उदय ३० प्रकृतिरूप है, अनिवृत्तिकरण व सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें बन्ध एक प्रकृतिका और उदय ३० प्रकृतिका है, उपशान्तकषायगुणस्थानमें बन्धका अभाव तथा उदय ३० प्रकृतिका जानना, क्षीणकषायादि गुणस्थानोंमें ५३ प्रकृतियोंका क्षय हो जानेसे ९२ प्रकृतिका सत्त्वस्थान नहीं है ७९ प्रकृतिका सत्त्व है। देवोंमें ९२ प्रकृतिका सत्त्व रहते हुए भवनत्रिक और सौधर्मयुगलवाले मिथ्यादृष्टि देवोंके २५-२६-२९ व ३० प्रकृतिक बन्धसहित उदय २१२५-२७-२८ व २९ प्रकृतिका है, सासादनगुणस्थानमें ९२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान नहीं है, मिश्रगुणस्थानमें बन्ध मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिका और उदय भी २९ प्रकृतिका ही है, असंयतगुणस्थानमें बन्ध मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिक एवं उदय भवनत्रिकके तो २९ का, सौधर्मयुगलमें २१-२५-२७-२८ व २९ प्रकृतिका है। आगे सहस्रारस्वर्गपर्यन्त १० स्वर्गोंमें मिथ्यादृष्टिके तिर्यञ्च या मनुष्यगतियुत २९ का और तिर्यञ्चउद्योतयुत ३० का; आनतस्वर्गसे उपरिमग्नैवेयकपर्यन्त मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिक बन्ध है, उदय भवनत्रिकसे उपरिमग्रैवेयकपर्यन्त २१-२५-२७-२८ व २९ प्रकृतिका है। यहाँ सासादनगुणस्थानमें ९२ प्रकृतिक सत्त्व नहीं है, मिश्रगुणस्थानमें भवनत्रिकसे उपरिमौवेयकपर्यन्त मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिका बन्ध और उदय भी २९ प्रकृतिका है, असंयतगुणस्थानमें सनत्कुमारस्वर्गसे अनुत्तरविमानपर्यंत बन्ध मनुष्यगतियुत २९ एवं उदय २१-२५-२७-२८ व २९ प्रकृतिका पाया जाता है। "तिरिये ण तित्थसतं'' इत्यादि गाथाके वचनानुसार तिर्यञ्चबिना देव-नारकी व मनुष्यके ही ९१ प्रकृतिका सत्त्व पाया जाता है। यहाँ धर्मानरकके नारकियोंमें ९१ प्रकृतिका सत्त्व रहते हुए मिथ्यादृष्टिमें बन्ध मनुष्यसहित २९ प्रकृतिका, उदय २१-२५ प्रकृतिका है। यहाँ २७ आदि प्रकृतिका उदय नहीं है क्योंकि शरीर पर्याप्ति होनेपर तीर्थंकर की सत्तावाला मिथ्यादृष्टि सम्यग्दृष्टि होजाता है। सासादन मिश्र में ९१ का सत्त्व नहीं है। असंयतगुणस्थानमें तीर्थकर व मनुष्यगतियुत ३० प्रकृतिक बन्धसहित उदय २१२५-२७-२८ व २९ प्रकृतिका पाया जाता है। वंशा-मेघानरकमें भी सर्वकथन घर्मावत् ही जानना, किन्तु विशेष यह है कि असंयतगुणस्थानमें २७-२८-२९ प्रकृतिक उदय पाया जाता है। अञ्जनादि पृवियोंमें ९१ प्रकृतिकका सत्त्व नहीं है। मनुष्योंके ९१ प्रकृतिरूप सत्त्व रहते हुए मिथ्यात्वगुणस्थानमें बन्ध नरकगति सहित २८ या मनुष्यगतिसहित २९ व उदय ३० प्रकृतिका है। सासादमिश्र में ९१ का सत्त्व नहीं है। असंयतगुणस्थानमें बंध देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिका तथा उदय २१-२६-२८२९ व ३० प्रकृतिका है। आगे देशसंयतसे अपूर्वकरणगुणस्थानके छठेभागपर्यंत बन्ध देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिका, अपूर्वकरणके सप्तमभागसे उपशम सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त बन्ध एक प्रकृतिका तथा उपशान्तकषायगुणस्थानमें बन्धका अभाव है और उदय देशसंयतगुणस्थानसे उपशान्तकषायपर्यन्त
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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