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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६४२ इगिणवदीए बंधा अडवीसत्तिदयमेक्कयं चुदओ। तेणउदि वा णउदीबंधा बाणउदियं व हवे ॥७५६ ॥ चरिमदुवीसूणुदओ तिसु दुसु बंधा छ तुरियहीणं च । बासीदी बंधुदया पुव्वं विगिवीस चत्तारि ॥७५७ ।। सीदादिचउसु बंधा जसकित्ती समपदे हवे उदओ। इगिसगणवधियवीसं तीसेक्कत्तीसणवगं च ॥७५८॥ बीसं छडणववीसं तीसं चट्टं च विसमठाणदया। दसणवगे ण हि बंधो कमेण णवअट्ठयं उदओ॥७५९ ।।कुलयं।।
अर्थ – ९३ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान २९-३०-३१ व १ प्रकृतिरूप चार और उदयस्थान २१-२५-२६-२७-२८-२९ व ३० प्रकृतिक ७ हैं। ९२ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान ३१. के बिना २३-२५-२६-२८-२९-३० व १ प्रकृतिरूप सात एवं उदयस्थान २१-२४-२५-२६-२७-२८-२९३० व ३१ प्रकृतिके १ हैं। ९१ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान २८-२९-३० व १ प्रकृतिरूप चार तथा उदयस्थान २१-२५-२६-२७-२८-२९ व ३० प्रकृतिरूप सात हैं। ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान २३-२५-२६-२८-२९-३० व १ प्रकृतिरूप और उदयस्थान अन्तिम दो एवं २० प्रकृतिकबिना शेष ९ हैं। ८८ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्धान २३-२५-२६-२९ व ३० प्रकृतिरूप पाँच एवं उदयस्थान ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थानके समान ही हैं। ८४ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें २३-२५-२६-२९ व ३० प्रकृतिक पाँच बन्धस्थान एवं ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थानके समान ९ उदयस्थान हैं। ८२ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान २३-२५-२६-२९ व ३० प्रकृतिक पाँच, उदयस्थान २१-२४-२५ व २६ प्रकृतिक चार हैं। ८० प्रकृतिक सत्त्वस्थानको आदि करके चार सत्त्वस्थानों में बन्धस्थान तो एक यशस्कीर्ति प्रकृतिरूप है और उदयस्थान ८० व ७८ प्रकृतिक सत्त्वमें तो २१-२७-२९-३०-३१ व ९ प्रकृतिका तथा ७९ व ७७ प्रकृतिक सत्त्वमें २०-२६-२८-२९-३० व ८ प्रकृतिरूप उदयस्थान हैं। १० व ९ प्रकृतिक सत्त्वस्थानोंमें बन्धस्थानका अभाव है तथा उदयस्थान क्रमसे ९ व ८ प्रकृतिका पाया जाता है।
विशेषार्थ - ९३ प्रकृतिका सत्त्व कर्मभूभिजपर्याप्त और निर्वृत्त्यपर्याभमनुष्य और वैमानिकदेवोंके पाया जाता है। "तित्थाहारा जुगवं सव्वं" इत्यादि गाथा ३३३ में मिथ्यात्वादि तीन गुणस्थानोंमें ९३ प्रकृतिका सत्त्व नहीं पाया जाता है, किन्तु असंयत मनुष्यके ९३ प्रकृतिका सत्त्व पाया जाता है तब असंयतगुणस्थानमें बन्ध देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिका और उदय २१-२६-२८-२९ व ३० प्रकृतिका है, देशसंयतगुणस्थानमें बन्ध देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिका तथा उदय ३० प्रकृतिक है।