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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६४१ ३० प्रकृतिक । ८ । २३-२५-२६-२८-२९. । १०. ३०-३१ व बन्ध शून्य ! ९३-९२-९१-९०८८-८४-८०-७९-७८ व ७७ प्रकृतिक ३१ प्रकृतिक २३-२५-२६-२८ ९२-९७-८८२९ व ३० प्रकृतिक, ८४-८० व ७८ बन्ध शून्य ९ प्रकृतिक ८०-७८ व | ७९-७७ व ९ प्रकृतिक आगे सत्त्वस्थान को आधार और बन्ध-उदयस्थान को आधेय मानकर निरूपण करते ८ प्रकृतिक सत्ते बंधुदया चदुसग सगणव चदुसगं च सगणवयं । छण्णव पणणव पणचदु चदुसिगिछवं णभेक्क सुण्णेगं ॥७५३ ।। अर्थ – ९३ आदि प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानोंमें बन्ध-उदयस्थान क्रमसे ९३ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान व उदयस्थान क्रमशः ४ और ७ हैं। ९२ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान ७ व उदयस्थान ९,९१ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान ४ व उदयस्थान ७, ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान ७ व उदयस्थान ९, ८८ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान ६ व उदयस्थान ९, ८४ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान ५ एवं उदयस्थान ९, ८२ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान ५ और उदयस्थान ४, ८० प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान १ तथा उदयस्थान ६, ७९ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान १ व उदयस्थान ६, ७८ प्रकृतिक सत्त्वस्थानमें बन्धस्थान १ और उदयस्थान ६, ७७ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्ध व उदयस्थान क्रमसे १ व ६ हैं, १० प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान शून्य एवं उदयस्थान १ तथा ९ प्रकृतिक सत्त्वमें बन्धस्थान शून्य और उदयस्थान १ जानना। आगे उपर्युक्त कथन का स्पष्टीकरण ६ गाथाओं से करते हैं तेणउदीए बंधो उगुतीसादीचउक्कमुदओ दु। इगिपणछस्सगअट्ठयणववीसं तीसयं यं ॥७५४ ।। बाणउदीए बंधा इगितीसूणाणि अट्टठाणाणि । इगिवीसादीएमत्तीसंता उदयठाणाणि ॥७५५ ।।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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