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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६३७ तीर्थङ्करप्रकृतिकी सत्तावाला घर्मानरकमें जाकर सम्यक्त्वसे भ्रष्ट नहीं होता है, सासादन व मिश्रगुणस्थानमें यह उदयस्थान नहीं है,असंयतगुणस्थानमें २८ प्रकृतिक उदयमें मनुष्यगतियुत २९ व मनुष्यगति व तीर्थकरयुत ३० प्रकृतिरूप बन्धसहित सत्त्व ९२-९१ व ९० प्रकृतिका जानना। वंशा-मेघापृथ्वीके मिथ्यात्वगुणस्थानमें २८ प्रकृतिक उदयमें बन्ध-सत्त्वसम्बन्धी कथन धर्मानरकवत् है किन्तु इनके ९१ प्रकृतिका भी सत्त्व है। सासादन और मिश्र गुणस्थानोंमें यह उदयस्थान नहीं है। असंयत में बन्ध मनुष्यगति तीर्थंकर युत ३० का और सत्त्व ९१ का है। आगे अञ्जनादि तीन नरकोंके मिथ्यात्वगुणस्थानमें २८ प्रकृतिक उदयमें बन्ध और सत्त्वसम्बन्धी कथन घर्मानरकवत् जानना, किन्तु यहाँ सासादनादि तीनगुणस्थानोंमें २८ प्रकृतिक उदयस्थान नहीं है। माघवी नामक नरकके मिथ्यात्वगुणस्थानमें २८ प्रकृतिक उदय रहते हुए तिर्यञ्चगतियुत २९ और तिर्यञ्चगति व उद्योतसहित ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९२ व ९० प्रकृतिक सत्त्व है, किन्तु सासादनादि गुणस्थानोंमें २८ प्रकृतिरूप उदय नहीं पाया जाता है। तिर्यञ्चोंके २८ प्रकृतिक उदय रहते हुए मिथ्यात्वगुणस्थानमें २३-२५-२६-२८-२९ व ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९२-९०-८८ व ८४ प्रकृतिक सत्त्व पाया जाता है, सासादन और मिश्रगुणस्थानमें यह उदयस्थान नहीं है। भोगभूमिज असंयततिर्यञ्चमें २८ प्रकृतिक उदय रहते हुए देवगतियुत २८ प्रकृतिक बधसहित ९२ व १० पदाजिक सच है। कर्मभूमिज असंयत व देशसंयतगुणस्थानमें यह उदयस्थान नहीं होता है। मनुष्यके २८ प्रकृतिक उदयमें मिथ्यात्वगुणस्थानमें बन्ध-सत्त्व सम्बन्धी सर्वकथन तिर्यञ्चवत् है। यहाँ सासादन व मिश्र गुणस्थान में यह उदयस्थान नहीं है, असंयतगुणस्थानमें इस उदयस्थानके रहते हुए देवगतियुत २८ एवं देवगतिं व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिक बन्धसहित सत्त्व ९३-९२-९१ व ९० प्रकृतिरूप पाए जाते हैं, देशसंयतगुणस्थानमें यह उदयस्थान नहीं है। आहारककाययोगकी उच्छ्वासपर्याप्तिमें २८ प्रकृतिका उदय रहते हुए देवगतियुत २८ एवं देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिक बन्धसहित ९३ व ९२ प्रकृतिक सत्त्व है। तीर्थङ्कररहित दण्डसमुद्घातके औदारिककाययोगमें २८ प्रकृतिक उदय रहते हुए बन्धका तो अभाव है, किन्तु सत्त्व ७९ व ७७ प्रकृतिका है। २७ प्रकृतिक उदय रहते हुए देवोंके जो बन्ध व सत्त्वस्थान कहे थे वे ही यहाँ २८ प्रकृतिक उदयमें भी जानना। २९ प्रकृतिका उदय नारकियोंके भाषापर्याप्तिकालमें दुःस्वरसहित होता है। २९ प्रकृतिक उदय रहते हुए सभी नारकियोंके मिथ्यात्वगुणस्थानमें तिर्यञ्च या मनुष्यगतियुत २९ एवं तिर्यञ्च-उद्योतयुत ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९२ व ९० प्रकृतिक सत्त्व है। यहाँ विशेषबात यह है कि माघवीनरकमें मनुष्यगतियुत बन्धस्थान नहीं है तथा द्वितीय-तृतीय नरकके प्रथम अन्तर्मुहूर्तमें ९१ प्रकृतिका भी सत्त्व है। सासादनगुणस्थानमें २९ प्रकृतिका उदय रहते हुए बन्ध तो मिथ्यात्वगुणस्थानवत् और सत्त्व ९० प्रकृतिका, मिश्गुणस्थानमें मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिक बन्धसहित ९२-९० प्रकृतिका सत्त्व है, असंयतगुणस्थानमें धर्मा-वंशा-मेघानरकमें मनुष्यगतियुत २९ और मनुष्यगति व तीर्थङ्करयुत ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९२-९१ व ९० प्रकृतिका सत्त्व पाया जाता है अञ्जनादि शेष चार नरकोंमें २९ प्रकृतिक उदय
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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