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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२६ आनुपूर्वी कहते हैं। इसके चारभेद हैं - नरकगत्यानुपूर्वी-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी-मनुष्यगत्यानुपूर्वी और देवगत्यानुपूर्वी । नरकगति को प्राप्त होने वाले पञ्चेन्द्रियपर्याप्तजीव के विग्रहगति में पूर्वशरीर का आकार जिसके उदय से हो वह नरकगत्यानुपूर्वी है इसी प्रकार अन्य तीनों में भी जानना। जिसके उदय से शरीर लोहे के पिंडवत् नीचे न गिरे और आक की रुई के समान हलका होने से पर भी न जाय उसे अगुरुलघुनामकर्म कहते हैं। . . . . . 'उपेत्य पात: उपधात:' अपने घात का नाम उपघात है। जिसके उदय से अपने अगों से अपना ही घात हो उसे उपघातनामकर्म कहते हैं। जैसे - बड़े सींग, लम्बे स्तन, मोटा पेट इत्यादि। जिसके उदय से अन्य का घात करने योग्य अङ्ग हों उसे परघातनामकर्म कहते हैं। जैसे - तीक्ष्ण सींग, नख, सर्पादि की डाढ़ में विष इत्यादि। जिसके उदय से आतपरूप शरीर हो उसे आतपनामकर्म कहते हैं। इसप्रकृति का उदय सूर्य के बिम्ब में उत्पन्न होने वाले बादरपृथ्वीकायिकपर्याप्तजीवों के होता है। अथवा सूर्यकान्तमणि में भी होता है। जिसके उदय से उद्योतरूप (चमक रूप) शरीर हो उसे उद्योतनामकर्म कहते हैं। इसका उदय | चन्द्रमा तथा नक्षत्रों के बिम्ब में तथा जुगुनुआदि तिर्यंचों में पाया जाता है। जिसके उदय से आकाश में गमन हो उसे विहायोगतिनामकर्म कहते हैं। इसके दो भेद हैं - प्रशस्त और अप्रशस्तविहायोगति। जिसके उदय से द्वीन्द्रियादि जीवों में जन्म हो उसे त्रसनामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से अन्य को रोकें एवं अन्य से रुकें ऐसा शरीर प्राप्त हो वह बादरनामकर्म है। जिसके उदय से आहारादि पर्याप्ति १. परघात की इसी तरह की परिभाषा कर्मप्रकृति पृ. ३१ (ज्ञानपीठ), धवल ६/५९, धवला १३/३६४, ह. पु. ५८/ २६३ पष्ठ ९०१ गो. क. गाथा ३३ की कन्नड व संस्कत टीकाएँ गो.क.२१ पं. मनोहरलालजी शि.शा. की टीका. प्रा. पं. सं. पृ. ५५८-५९, ज.सि.प्र. पृ. ६९, त.सा. ५/३७ (डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य) (श्वे. सभाष्य तत्त्वार्थाधिगम भाष्य ८/१२/३७१) आदि में है। इस परिभाषा के अनुसार परघात शुभ प्रकृति सिद्ध होती है । परन्तु सर्वार्थसिद्धि ८/११ पृ. २९७ (ज्ञानपीठ) में परघात की परिभाषा इस तरह दी है - जिसके उदय से परशस्त्रादि का निमित्त पाकर व्याघात होता है वह परघात नाम कर्म है। (यनिमित्त: पर-शस्त्रादेाघात: तत्परघातनाम) तथा इसी तरह की परिभाषा रा.वा. ८/११/१४ पृ. ४८८, श्लो. वा. ८/११ भाग ७ पृष्ठ ६४ (कुंथुसागर ग्रन्थमाला) में दी है। जिससे परघात प्रकृति को अशुभपना प्राप्त होता है। मूलाचार १२३७ आचारवृत्ति में परघात की दोनों प्रकार की परिभाषाओं का संग्रह किया गया है। श्लोकवार्तिक भाग ७ पृ.६४-६५ में भाषा टीका में लिखा है कि चूंकि परघात को पुण्य प्रकृति में गिनाया है अत: परघात की यह परिभाषा अच्छी है कि “अन्य को घात करने वाले तीक्ष्ण सींगनख दाद आदिक अवयव जिस कर्म के उदय से बने वह परघात नाम कर्म है।" २. मूलाचार पृ. ३६६ भाग २ ज्ञानपीठ
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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