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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - २७ पूर्ण हों वह पर्याप्त' नामकर्म है। पर्याप्तियों के छहभेद हैं- आहार शरीर इन्द्रिय- श्वासोच्छ्रास-भाषामनपर्याप्ति। शरीरनामकर्म के उदय से उत्पन्न शरीर सो जिसके उदय से एकशरीर का स्वामी एक ही हो उसे प्रत्येकशरीरनामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से रसादि धातु - उपधातु अपने-अपनेरूप से स्थिर हों उसे स्थिरनामकर्म कहते हैं। कहा भी है - रसाद्रक्तं ततो मांस, मांसान्मेदः प्रवर्तते । मेदोऽस्थिततो मज्जं, मज्जाच्छुक्रं ततः प्रजा ॥ १ ॥ वात: पिस तथा श्लेष्मा, सिरा स्नायुश्च चर्म च । जठराग्निरिति प्राज्ञैः प्रोक्ताः सप्तोपधातवः ॥ २ ॥ श्लोकार्थ - रससे रक्त, रक्तसे मास, मांससे मेदा, मेदासे हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जासे शुक्र की उत्पत्ति होती है। तथा शुक्र से संतानोत्पत्ति होती है। ये सप्तधातु क्रमसे एक दूसरे रूप परिणमती हैं। इनके बनने में ३० दिन लगते हैं अतः प्रत्येकधातु को बनने में ४ और २ दिन के सातवेंभाग प्रमाण कल लगता है; तथापि इन सप्तधातुओं का अभाव नहीं होता अपने रूप में बनी रहती हैं अतः यह स्थिरनामकर्म है। तथा वात-पित्तश्लेष्म (कफ) - सिरा स्नायु चर्म और उदरात्रि ये सात उपधातु हैं। ये भी शरीर में परस्पर में परिणमन करती हुई स्थिर रहती हैं। जिसके उदय से मस्तकादि अवयव प्रशस्त (सुन्दर) होते हैं उसे शुभनामकर्म कहते हैं। अथवा नाभि के ऊपर के अवयव शुभ होते हैं। जिसके उदय से अन्य को अपने से प्रीति हो वह सुभगनामकर्म है । अथवा जो सौभाग्य को उत्पन्न करे। रे जिसके उदय से मनोज्ञ स्वर हो उसे सुस्वरनामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से प्रभा - कांति सहित शरीर हो वह आदेयनामकर्म है। अथवा जिसके उदय से बहुजन मान्यता प्राप्त हो वह भी आदेयनामकर्म है। जिसके उदय से अपना पुण्यरूप पवित्रगुण जगत में प्रसिद्ध हो उसे यशः कीर्तिनामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर में अङ्गोपान आदि की रचना हो वह निर्माणनामकर्म है। इसके दो भेद हैं- स्थाननिर्माण और प्रमाणनिर्माण। जातिनामकर्म के उदय की अपेक्षा से नेत्रादिक जिसस्थान पर चाहिए उसी स्थान पर हों वह स्थाननिर्माण है। तथा काल जातिका आश्रय करके यथाप्रमाण हों वह प्रमाणनिर्माण है। अर्हतपद का कारण तीर्थंकरनामकर्म है। जिसके उदय से एकेन्द्रिय में उत्पत्ति हो वह स्थावरनामकर्म है। सूक्ष्मशरीर बनानेवाला सूक्ष्मनामकर्म है। छहपर्याप्तियों की पूर्णता के अभाव का कारण अपर्याप्तनामकर्म है। एक शरीर के १. स. सि. ८ / ११ टीका २. ध. पु. ६ पृ. ६३ । ३. ध. पु. ६ पृ. ६५ /
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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