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________________ ..:.:: :.. गोटसार कमकाण्ड-२५ जिसके उदय से अङ्गोपाङ्ग का भेद हो वह अङ्गोपाङ्गनामकर्म है। इसके तीन भेद हैं - औदारिकवैक्रियिक और आहारकअङ्गोपाङ्ग । __ जिसके उदय से हड्डियों के बन्धन विशेष होते हैं उसे संहनननामकर्म कहते हैं। इसके छह भेद हैं - वज्रर्षभनाराच-वज्रनाराच-नाराच-अर्धनारःच-कीलित और असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन।। संहनन नाम हड्डियों के समूह का है। जिससे बाँधा जावे उसे ऋषभ कहते हैं और जो वज्र के समान अभेद्य अर्थात् जिसका भेदन न किया जाय उसे वज्र कहते हैं। नाराच नाम कीले का है। जैसे - किवाड़ के कब्जों के बीच लोहे का कीला होता है। अत: जिस शरीर में वज्र की हड्डियाँ हों, वज्र का ऋषभ, वज्र का नाराच हो उसे वज्रर्षभनाराचशरीरसंहनन कहते हैं। जिसमें वज्र के बन्ध न हों, सामान्य बन्धन से बाँधा जावे, किन्तु कीला व हड्डियाँ वज्र की हों; ऐसा शरीर जिसके उदय से हो उसे वजनाराचशरीरसंहनन कहते हैं। जिस कर्म के उदय से वज्र विशेष से रहित साधारण नाराच से कीलित हड्डियों की संधि हो उसे नाराचशरीरसंहनन कहते हैं। जिस कर्म के उदय से अस्थिसन्धि अर्धकीलित हो उसे अर्धनाराचशरीरसंहनन कहते हैं। जिसके उदय से वज्र की हड्डिया न हों, किन्तु वे परस्पर में नोक व गडे के द्वारा फँसी हुई हों उसे कीलितसंहनन कहते हैं। जिसके उदय से सरीसृप की हड्डियों के समान नसों से बँधी हुई पृथक्-पृथक् हड्डियाँ हों उसे असंप्राप्तासृपाटिकासंहनननामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर का वर्ण होता है उसे वर्णनामकर्म कहते हैं। इसके पाँचभेद हैं - कृष्णनील-रक्त-हरित और शुक्ल। जिसके उदय से शरीर में गन्ध होती है उसे गन्धनामकर्म कहते हैं। इसके दो भेद हैं - सुगन्ध और दुर्गन्ध। जिसके उदय से शरीर में रस होता है उसे रसनामकर्म कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं - तिक्त, कटु, कषायला, अम्ल और मधुर । जिसके उदय से शरीर में स्पर्श हो उसे स्पर्शनामकर्म कहते हैं। इसके आठभेद हैं - कर्कशमृदु-गुरु-लघु-शीत-उष्ण-स्निग्ध और रुक्ष। जिसके उदय से विग्रहगति में पूर्वशरीर का आकार रहे उसे रूप से एकमेकपना प्राप्त हो जाता है वह शरीर संघात नामकर्म है। सारतः बंधन नाम कर्म के उदय से शरीर परमाणु मिल जाते हैं, परन्तु तिल के लङ्क के समान छिद्र सहित रहते हैं। संघात के उदय से वे ही परमाणु चिकने आटे के लङ्क के समान (अथवा कौच के अन्दर स्थित परमाणुओं के समान) सर्वत्र एकमेक (= छिद्ररहित) हो जाते हैं। (मूलाचार, पृ. ३६२-६३, भाग २, ज्ञानपीठ, अनु. पू. ज्ञानमती जी) ___ वृक्ष की पींड से डालें, डालियाँ बंधे रहते हैं, धड़ से बाँहें, बाँहों में अंगुलियां बँधी रहती है। यह बंधन कर्म है। शरीर में आवश्यक छिद्रों के अतिरिक्त व्यर्थ के छेदों का नहीं दिखना संघात का कार्य है। (श्लो.वा, ७/६३ भाषा)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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