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....... - गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२४
आत्मा मनुष्यपर्याय को प्राप्त हो तथा मनुष्यरूप उसके भाव व क्रिया हों उसे मनुष्यगति कहते हैं। जिसके उदय से आत्मा देवपर्याय को प्राप्त हो तथा देवगतिरूप उसके भाव व क्रिया हों वह देवगति है।
जिसके उदय से उपर्युक्त गतियों में अव्यभिचारीसादृश्यभावरूप से जीव इकट्ठे किये जावें उसे जातिनामकर्म कहते हैं।
जातिनामकर्म के पाँच भेद हैं - एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियजाति ।
जिसके उदय से आत्मा एकेन्द्रियशरीर को धारण करे उसे एकेन्द्रियजाति कहते हैं। जिसके उदय से आत्मा द्वीन्द्रियशरीर को धारण करे उसे द्वीन्द्रियजाति कहते हैं। जिसके उदय से आत्मा तीनइन्द्रिय के शरीर को धारण करे उसे त्रीन्द्रिय जाति कहते हैं। जिसके उदय से आत्मा चारइन्द्रियरूप शरीर को प्राप्त करे वह चतुरिन्द्रियजाति है। जिसके उदय से आत्मा पञ्चेन्द्रियशरीर को प्राप्त करे वह पञ्चेन्द्रियजाति है।
जिसके उदय से शरीर की रचना हो उसे शरीरनामकर्म कहते हैं। इसके पाँचभेद हैं - औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मणशरीर । जिसके उदय से औदारिकशरीर बने उसे औदारिकशरीर कहते हैं। जिसके उदय से वैक्रियिकशरीर बने वह वैक्रियिकशरीर है। जिसके उदय होने पर आहारकशरीर बनता है, वह आहारकशरीर है। जिसके उदय से तैजसशरीर बने उसे तैजसशरीर कहते हैं। जिसके उदय से कार्मणशरीर बनता है वह कार्मणशरीर है।
शरीरनामकर्म के उदय से जो आहारवर्गणारूपपुद्गलस्कन्ध ग्रहण किये हैं उनके प्रदेशों का परस्पर संश्लेषसम्बन्ध जिसके उदय में हो उसे बन्धननामकर्म कहते हैं। इसके औदारिकादि के भेद से पाँच भेद हैं। तथा औदारिक-औदारिकादि संयोगी भंग १५ हैं।
जिसके उदय से औदारिकादिशरीरों के प्रदेशों का परस्पर छिद्ररहित एकक्षेत्रावगाहरूप एकत्व प्राप्त हो उसे संघातनामकर्म कहते हैं।'
जिसके उदय से औदारिकादिशरीरों का आकार बने उसे संस्थाननामकर्म कहते हैं। इसके छह भेद हैं - समचतुरस्र-न्यग्रोधपरिमण्डल-स्वाति-कुब्जक-वामन और हुण्डकसंस्थान। १. बन्धन तथा संघात नामकर्म में अन्तर !
औदारिक आदि शरीर के पुद्गल स्कन्धों का परस्पर में संश्लेष संबंध, शरीरबन्धन नामकर्मका कार्य है। यदि शरीरबन्धन नाम कर्म न हो तो यह शरीर बालू निर्मित पुरुष-शरीर जैसा हो जाए। औदारिक आदि शरीर के परमाणुओं का परम्पर में छिद्र-रहित प्रवेशानुप्रवेश होकर एकरूपता लाना संघात नामकर्म का कार्य है। यदि संघात नामकर्म न हो तो शरीर तिल के लड्डू के समान ही रहे। बंधन नामकर्म के उदय से एकरूप बंधन से बँधे हुए औदारिक आदि परमाणुओं का जिस कर्म के उदय से औदार्य चिकने