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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२३
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विरताविरती को अल्पमात्र भी न होने दे उसे अप्रत्याख्यानक्रोध-मान-माया-लोभ कहते हैं। प्रत्याख्यानकषाय सकल-संयम को नहीं होने देती। जो संयम के साथ, 'सं' - एकीभूत होकर, 'ज्वलति' अर्थात् प्रकाशमान हो उसे सवलन कहते हैं। (यह कषाय यथाख्यातसंयम का धात करती है) इस प्रकार ये १६ प्रकार कषायवेदनीय के हैं।
नोकषाय - 'नो' अर्थात् ईषत् (किंचित्) कषाय का वेदन करावे उसे नोकषाय कहते हैं। इसके नव भेद हैं
जिसके उदय से हँसी आवे, वह हास्य है। जिसके उदय से क्षेत्रादि में प्रीति हो उसे रति कहते हैं। जिसके उदय होने पर देशादि में अप्रीति हो वह अरति' कहलाती है। जिसका उदय इष्टवियोगज क्लेश उत्पन्न करे वह शोक है। जिसके उदय से भय उत्पन्न होता है उसे भय कहते हैं। जिसके उदय से अपने दोषों को तो बैंक तथा अन्य के दोषों को प्रकट करे उसे जुगुप्सा कहते हैं। अथवा ग्लानि करना जुगुप्सा है।
जिसके उदय से स्त्रीसंबंधी भावों को प्राप्त हो उसे स्त्रीवेद कहते हैं। जिसके उदय से पुरुषसम्बंधी भावों को प्राप्त हो वह पुरुषवेद है। जिसके उदय से नपुंसक सम्बन्धी भावों को प्राप्त हो उसे नपुसंकवेद कहते हैं।
नर-नारकादिभव को जो प्राप्त करावे तथा उसमें रोके रखे वह आयुकर्म है। इसके चार भेद हैं - जो नरक को प्राप्त करावे तथा उसमें रोके रखे वह नरकायु है। जो तिर्यंचयोनि को प्राप्त करावे तथा उसमें रोके रखे उसे तिर्यंचायु कहते हैं। जो मनुष्ययोनि को प्राप्त करावे तथा उसमें रोके रखे उसे मनुष्यायु कहते हैं। जो देवयोनि को प्राप्त करावे और उसमें रोके रखे वह देवायु है।
नामकर्म के पिण्ड-अपिण्डप्रकृतिरूप ४२ भेद हैं। जिसके उदय से आत्मा पर्याय से पर्यायान्तर को प्राप्त हो उसे गति' कहते हैं। जिसके उदय से उस-उस गतिरूप क्रिया हो वह गतिनामकर्म है। गति के चार भेद हैं - नरक-तिर्यञ्च-मनुष्य और देवगति । जिसके उदय से आत्मा नरकपर्याय को प्राप्त हो तथा नरकरूप उसके भाव व क्रिया हों उसे नरकगति कहते हैं। जिसके उदय से आत्मा तिर्यञ्चपर्याय को प्राप्त हो एवं तिर्यञ्चरूप उसके भाव व क्रिया हों, वह तिर्यञ्चगति कहलाती है। जिसके उदय से
१. रमने को रति कहते हैं, अथवा जिसके द्वारा जीव विषयों में आसक्त होकर रमता है वह 'रति' है। २. जिन कर्मस्कन्धों से द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव में जीव को अरुचि उत्पन्न होती है वह अरति' है। ३, सोच करने को शोक कहते हैं। अथवा जो विषाद उत्पन्न करता है, उसे शोक कहते हैं। ४. ग्लानि होने को जुगुप्सा कहते हैं। जिन कर्मों के उदय से ग्लानि होती है उनकी 'जुगुप्सा' संज्ञा है।
(ध.पु. ६ पृ. ४७-४८) ५. "भवाद्भवसंक्रान्तिर्वागतिः।" एक भव से दूसरे भव में जाने को गति कहते हैं । (धवल पु. १ पृ. ५३५)