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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२२
जो आवरण करे अथवा जिसके द्वारा आवरण किया जाय वह आवरणकर्म है, सो । चक्षुदर्शनावरण-अचक्षुदर्शनावरण-अवधिदर्शनावरण-केवलदर्शनावरण इन चारप्रकार के दर्शनों को आवरण करने वाले चार दर्शनावरण कर्म हैं तथा पाँच निद्रा, इन निद्रा का लक्षण पहले स्वयं नेमिचन्द्राचार्य कह आये हैं।
वेदनीय के साता-असातारूप दो भेद हैं - इनका लक्षण भी पूर्व में कह चुके हैं।
मोहनीयकर्म के दो भेद हैं - दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय। दर्शनमोहनीय के तीन भेद हैंमिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व । बन्ध की अपेक्षा मिथ्यात्वरूप एक ही भेद है तथा उदय व सत्त्व की अपेक्षा तीनभेद हैं।
जिसके उदय से जीव सर्वज्ञप्रणीत मार्ग से पराङ्मुख, तत्त्वार्थश्रद्धान में निरुत्सुक, आत्मिकहिताहित के विचार से रहित मिथ्यादृष्टि होता है उसे मिथ्यात्य कहते हैं। कोदों धान्य को प्रक्षालन करने से जिस प्रकार उसकी तीव्र पासमाक्ति कुन का होकर माती है, उसी प्रकार जिसद्रव्य में मिथ्यात्व की तीव्र अनुभागशक्ति कुछ क्षीण हो जाय और कुछ मन्द रह जाय उसे सम्यग्मिथ्यात्व कहते हैं। प्रक्षालित मादककोदों के खाने से जिसप्रकार कुछ मदवान होता है और कुछ चतुर भी रहता है उसी प्रकार 'सम्यम्मिथ्यात्व' प्रकृति के उदय से आत्मा के सम्यक्-मिथ्यात्वरूप मिश्रपरिणाम होते हैं। अर्थात् सर्वज्ञकथित तत्त्वों और असर्वज्ञकथित अतत्त्वों का युगपत् श्रद्धान होता है। जो आत्मा के श्रद्धान को नहीं रोकती, किन्तु सम्यक्त्व की निर्मलता व स्थिरता का घात करती है, वह सम्यक्त्व प्रकृति है।'
आचरण करना अथवा जिसके द्वारा आचरण किया जाय अथवा आचरण मात्र को चारित्र कहते । हैं। इस चारित्र को जो मोहे या जिसके द्वारा यह चारित्र मोहा जावे वह चारित्रमोहनीय कर्म है। चारित्रमोहनीयकर्म कषायवेदनीय और नोकषाय-वेदनीय के भेद से दोप्रकार का है।
जो आत्मा के चारित्रगुण का घात करे उसे कषाय कहते हैं। तथा ईषत् (किंचित्) कषाय को नोकषाय कहते हैं। कषायवेदनीय के सोलह भेद हैं - अनन्तानुबन्धीक्रोध-मान-माया-लोभ, अप्रत्याख्यानावरणक्रोध-मान-माया-लोभ, प्रत्याख्यानावरणक्रोध-मान-माया-लोभ, सज्वलनक्रोधमान-माया-लोभ।
अनन्त संसार का कारण होने से मिथ्यात्व अनन्त है, उस मिथ्यात्व की जो चिरसङ्गिनी (अनुबन्धिनी) है वह अनन्तानुबन्धी है। जो 'अ'-ईषत् प्रत्याख्यान-संयम अर्थात् देशसंयम या
१. ज.ध. पु. ५ पृष्ठ १३० २. "सुखदुःख बहुशस्य कर्मक्षेत्र कृषन्तीति कषायाः । सुख दुःख रूपी नानाप्रकार के धान्य को उत्पन्न करने वाले कर्मरूपी
क्षेत्र का जो कर्षण करती है अर्थात् फल उत्पन्न करने योग्य करती है, वह कषाय है।" (धवल पु. १ पृ. १४१)