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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२१ अर्थ - आग के मूल और प्रभा दोनों ही उष्ण रहते हैं अत: उसके उष्णस्पर्श-नामकर्म का उदय है। जिसकी केवल प्रभा अर्थात् किरणों में उष्णपना हो उसको आतप कहते हैं। (आतपनामकर्म का उदय सूर्य के बिम्ब में तथा सूर्यकान्तमणि में उत्पन्न हुए बादरपर्याप्तपृथ्वीकायिक तिर्यञ्चजीवों में समझना चाहिए) तथा जिसकी प्रभा भी उष्णतारहित हो उसके उद्योतनामकर्म का उदय जानना। ताड़पत्रीय मूल गो. क. से उद्धृत सूत्र गोदकम्मं दुविहं उच्च-णीचगोदं चेइ। अंतराय पंचविहं दाण-लाभभोगोपभोगधीरिय-अंतरायं चेइ। सूत्रार्थ - गोत्रकर्म के दो भेद हैं - उच्चगोत्र-नीचगोत्र | अन्तरायकर्म के पाँचभेद हैं - दानान्तरायलाभान्तराय-भोगान्तराग-पभोगान्ताय और नीतगाय! . विशेषार्थ - आत्मप्रदेशों में एकक्षेत्रावगाहरूप से स्थित कर्म के योग्य कार्मण वर्गणाओं का दूध-पानी के समान संश्लेषसम्बन्ध होने को बन्ध कहते हैं। जैसे - पात्र विशेष में रखा हुआ अनेक प्रकार का रस, बीज, पुष्प-फलादि मदिरापने को प्राप्त होते जाते हैं उसी प्रकार कार्मणवर्गणा भी योग-कषाय के निमित्त से कर्मभाव को प्राप्त हो जाती हैं। एक ही आत्मा के परिणाम से ग्रहण की हुई नानापुद्गलकर्मवर्गणाएँ ज्ञानावरणादि अनेक कर्म के भेदरूपसे परिणत हो जाती है, जैसे एक बार में खाया हुआ अन्न रस, रुधिरादि अनेकरूप में परिणत होता है। अब उत्तरप्रकृतियों की निरुक्ति कहते हैं - जो मतिज्ञानपर आवरण करे वह मतिज्ञानावरण है। जो श्रुतज्ञान को आवरित करे वह श्रुतज्ञानावरण है। अवधिज्ञान को जो ढके उसे अवधिज्ञानावरण कहते हैं, जिसके द्वारा मन:पर्ययज्ञानका आवरण किया जावे उसे मनःपर्ययज्ञानावरण कहते हैं तथा केवलज्ञान को जो आवरित करे वह केवलज्ञानावरण है। शंका - अभव्य के मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान की शक्ति है या नहीं, यदि है तो अभव्य नहीं रहा तथा यदि शक्ति नहीं है तो दोनों ज्ञानों का आवरण कहना निरर्थक है। समाधान - द्रव्यार्थिकनय से उसके दोनों ज्ञानकी शक्ति पाई जाती है, किन्तु पर्यायार्थिकनय से शक्ति की व्यक्ति नहीं होती इसलिए आपके द्वारा दिये हुए दोष सम्भव नहीं हैं। जैसे - अंधपाषाण में स्वर्ण शक्तिरूप से है, परन्तु उसकी व्यक्ति नहीं है उसी प्रकार जानना। १. धवल पु. ६ पृ. ७ व ८
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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