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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५६९
होता है और सयोगीगुणस्थानपर्यन्त सत्त्व साता-असाता दोनोंका है। अयोगीगुणस्थान के अन्तसमयमें जिसका उदय है उसीका सत्त्व है अत: गुणस्थानोंकी अपेक्षा वेदनीयकर्मके भंग प्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त तो साताका बन्ध व उदय, सत्त्व दोनोंका अथवा साताका बन्ध, असाताका उदय, सत्त्व दोनोंका अथवा असाताका बन्ध साताका उदय, सत्व दौनाका अथवा असाता ही का बन्ध-उदय और सत्त्व दोनोंका इसप्रकार चारभंग हैं तथा आगे सयोगीपर्यन्त केवल साताका ही बन्ध है इसलिये साता ही का बन्ध या उदय और सत्त्व दोनोंका अथवा साताका बन्ध असाताका उदय, सत्त्व दोनोंका, अयोगकेवलीके बन्धका अभाव है। द्विचरमसमयपर्यन्त उदय साताका सत्त्व दोनोंका अथवा उदय असाताका सत्व दोनोंका, किन्तु चरमसमयमें साता ही का उदय, साता ही का सत्त्व अथवा, असाता ही का उदय असाता ही का सत्त्व इसप्रकार चारभंग हैं।
गुणस्थानोंकी अपेक्षासे वेदनीयकर्मके भंगोंकी संख्यासम्बन्धी सन्दृष्टि--
गुणस्थान
मिथ्यात्व
सासादन
मिश्र
असंयत
देशसंयत
प्रमत्त
अप्रमत्त
अपूर्वकरण
अनिवृत्ति.
सूक्ष्मसाम्प.
उपशान्तकषाय
क्षीणकषाय
सयोगकेवली
र अयोगकेवली
भंगों का कुल जोड
भग संख्या
आगे गोत्रकर्मसम्बन्धीभंग चारगाथाओंसे कहते हैं
णीचुच्चाणेगदरं बंधुदया होंति संभवट्ठाणे।
दोसत्ताजोगित्ति य चरिमे उच्चं हवे सत्तं ।।६३५ ।। अर्थ - नीचगोत्र और उच्चगोत्र इन दोनों से एक ही का बन्ध तथा उदय यथायोग्य स्थानोंमें होता है एवं सत्त्व अयोगीके द्विचरमसमयमें दोनोंका ही पाया जाता है, किन्तु अयोगीके चरमसमयमें जाकर उच्चगोत्रका ही सत्त्व पाया जाता है।
उच्चुव्वेल्लिदतेऊ वाउम्मि य णीचमेव सत्तं तु।
सेसिगिवियले सयले णीचं च दुगं च सत्तं तु ।।६३६ ।। अर्थ -- जिनके उच्चमोत्रकी उद्वेलना हुई ऐसे तेजकाय और वायुकायजीवोंके नीचगोत्रका ही सत्त्व है और शेष एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रिय तथा सकलेन्द्रिय के नीचगोत्रका अथवा दोनोंका ही सत्त्व है।
इसी बातको अगली गाथामें स्पष्ट करते हैं