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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५६८
९ प्रकृतिका तथा जिनके चारप्रकृतिका बन्ध है ऐसे अपूर्वकरणके द्वितीयभागसे उपशमकसूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त एवं १६ प्रकृतिका क्षय करने वाले क्षपक अनिवृत्तिकरणगुणस्थानपर्यन्त बन्ध ४ प्रकृतिका उदय ४ प्रकृतिका व पाँचप्रकृतिका तथा सत्त्व ९ का है। १६ प्रकृतिका क्षय करनेके पश्चात् सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त बन्ध-उदय उसीप्रकार है, किन्तु सत्त्व ६ प्रकृतिका है तथा जिनके बन्धका अभाव हुआ उनके उदय उसीप्रकार चार व पाँच प्रकृतिका है, सत्त्व उपशान्तकषायमें ९ का, क्षीणकषायके द्विचरमपर्यन्त ६ प्रकृतिका तथा क्षीणकषायगुणस्थानके चरमसमयमें उदय व सत्त्व चार-चार प्रकृतियोंका है। वेदनीय-गोत्र और आयुकर्मके विसयोगी भंगोंका विभागकरके गुणस्थानोंमें उनका कथनकर आगे मोहनीयकर्मका भी कथन करूंगा, आचार्यने ऐसी प्रतिज्ञा की है। दर्शनावरणकर्मकी उत्तरप्रकृतियोंके बन्ध-उदय और सत्त्वरूप त्रिसंयोगीभंगसम्बन्धी सन्दृष्टि
क्षीणकषाय
Poli
मिथ्यात्व
सासादन
मिश्र
असंयत
देशसंयत
प्रमत्त
| अपूर्वकरण| अनिवृत्ति. | सूक्ष्मसाम्प. | 'उप- -उप
अप्रमत्त
उपशान्तकषाय
द्वि
उपक्षपका
शमक
क्षपक
शमकक्षपक/उप
चरम समय
शमक
चरम
|
।
उदय
|४।५ | ४/५/४५/४।५ | ४५ |४२ | ४|४५ ४५४५/४/५/४/२ | ४५.४५ ४५ ४
अथानन्तर वेदनीयकर्मके उत्तरभेदोंमें त्रिसंयोगी भंगोंको कहते हैं
सादासादेक्कदरं बंधुदया होंति संभवट्ठाणे। दोसत्तं जोगित्तिय चरिमे उदयागदं सत्तं ॥६३३ ।। छट्ठोत्ति चारि भंगा दो भंगा होति जाव जोगिजिणे।
चउभंगाऽजोगिंजिणे ठाणं पड़ि वेयणीयस्स ॥६३४॥ जुम्मं ॥ अर्थ - साता और असातावेदनीयमेंसे किसी एकका ही बन्ध अथवा उदय यथायोग्यस्थानमें
१.प्रा.पं.सं..३०८ गा.१९-२० भी देखो।