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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५६१
चत्तारि वारमुवसमसेटिं समरुहदि खविदकम्मंसो । बत्तीसं बाराई संजममुवलहिय णिव्वादि ॥ ६१९ ।।
अर्थ - उपशमश्रेणीपर अधिक से अधिक चारबार ही चढ़ सकता है । पश्चात् क्षपकश्रेणी चढ़कर मोक्षको ही प्राप्त होता है। सकलसंयमको उत्कृष्टरूपसे ३२ बार ही धारण करता है। पश्चात् मोक्ष प्राप्त करता है ।। ६१९ ॥
मिथ्यात्वगुणस्थानमें एक जीवकी अपेक्षा तीर्थङ्कर और आहारकद्विकका युगपत् सत्त्व नहीं पाया जाता है, एक समयमें तीर्थंकर अथवा आहारकद्विकका सत्त्व रहेगा तथा नानाजीवोंकी अपेक्षा मिध्यात्वगुणस्थानमें इनका युगपत् सत्त्व रहता है । सासादनगुणस्थान में नानाजीवोंकी अपेक्षाभी आहारकद्रिक तीर्थंकरका सत्त्व नहीं है, मिश्रगुणस्थानमें तीर्थंकरप्रकृतिसहित सत्त्वस्थान नहीं है, किन्तु आहारकद्विकयुत स्थान तो है, क्योंकि तीर्थंकरको सत्तासहित जीवांक मिश्रगुणस्थान, तीर्थकर - आँहारकद्विककी युगपत् सत्तासहित मिथ्यात्वगुणस्थान और तीर्थंकर अथवा आहारकद्विकमेंसे किसी एकका भी सत्त्व होने पर मिध्यात्वरहित अनंतानुबंधीका उदय नहीं होनेसे सासादनगुणस्थान नहीं होता, किन्तु आहारकद्विककीसत्ता रहते हुए सम्यग्मिध्यात्वप्रकृतिका उदय होनेसे मिश्रगुणस्थान होता है । '
अथानन्तर चारोंगतियोंकी अपेक्षा गुणस्थानोंमें नामकर्मके सत्त्वस्थान कहते हैं
सुरणरसम्म पढमो सासणहीणेसु होदि बाणउदी ! सुरसम्मे णरणारयसम्म मिच्छे य इगिणउदी ||६२० ।।
अर्थ- सम्यग्दृष्टि देव - मनुष्यके ९३ प्रकृतिक सत्त्वस्थान, चारोंगतिके जीवोंमें सासादनगुणस्थानको छोड़कर अन्यत्र १२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान, सम्यग्दृष्टिदेवके तथा सम्यग्दृष्टि अथवा मिध्यादृष्टि मनुष्यनारकीके ९१ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है।
विशेषार्थ - ९३ प्रकृतिक सत्त्वस्थान मनुष्यके चतुर्थगुणस्थानसे ११ वें गुणस्थान तक सम्भव
है ।
उदी चदुग्गदिम्मि य तेरसखवगोत्ति तिरियणरमिच्छे। अडचउसीदी सत्ता तिरिक्खमिच्छम्मि बासीदी ||६२१ ।।
१. तित्धाहाराणुभयं सव्वं तित्धंण मिच्छ्गादितिये।
तस्सत्तकम्मियाणं तग्गुणठाणं ण संभवई ॥ ३३३ ॥ कर्मकाण्ड |