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गोम्मटसार' कर्मकाण्ड - ५६०
आगे तेजकाय - वायुकायकी उद्वेलनप्रकृतियोंको कहते हैं
उदुगे मणुवदुगं उच्चं उव्वेल्लदे जहण्णिदरं । पल्लासंखेज्जदिमं उव्वेल्लणकालपरिमाणं ।। ६१६ ॥
अर्थ - तेजकाय और वायुकायके मनुष्यद्विक और उच्चगोत्र इन तीन प्रकृतियों की उद्वेलना होती है तथा इस उद्वेलनाके कालका प्रमाण जघन्य अथवा उत्कृष्टरूपसे पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । इतने कालमें सर्वस्थितिको उद्वेलनारूप करता है।
उपर्युक्तकथनको स्पष्ट करते हैं
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पल्लासंखेज्जदिमं ठिदिमुव्वेल्लदि मुहुत्तअंतेण । संखेज्जसायरठिदिं पल्लासंखेज्जकालेण ॥ ६१७ ॥
अर्थ पल्यके असंख्यातवेंभागप्रमाण स्थितिकी अन्तर्मुहूर्तकालमें उद्वेलना करता है तो संख्यातसागरप्रमाण मनुष्यद्विकादिकी सत्तारूप स्थितिकी कितने कालमें उद्वेलना करेगा ? इसप्रकार विधि करनेपर पल्यके असंख्यातवेंभाग प्रमाणकालमें ही कर सकता है, यह सिद्ध हुआ ।
विशेषार्थ - पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कालके अग्रतनभागमें पल्यके अर्धच्छेदोंके असंख्यातवेंभागप्रमाण काण्डक अधस्तनरूप अन्तर्मुहूर्तसे अधिक सो यह तो प्रमाणराशि है तथा उस काण्डकका पड़ने अर्थात् उद्वेलनारूप होनेका काल अन्तर्मुहूर्त है इसको फलराशि मानना तथा सर्वस्थिति संख्यातसागरप्रमाण है सो इच्छाराशि मानना । फलराशिको इच्छाराशिसे गुणा करके प्रमाणराशिका भाग देनेपर पल्यका असंख्यातवभाग ही लब्ध आवेगा । अन्तर्मुहूर्तमें स्थितिके जितने निषेक उद्वेलनारूप किये उसका ही नाम काण्डक है।
आगे सम्यक्त्वादिकी विराधना कितनीबार होती है सो कहते हैं
सम्मत्तं देसजमं अणसंजोजणविहिं च उक्तस्सं । पल्लासंखेज्जदिमं बारं पडिवज्जिदे जीवो ॥ ६१८ ।।
अर्थ – प्रथमोपशमसम्यक्त्व, वेदकसम्यक्त्व, देशसंयम और अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजनाकी विधिको यह जीव उत्कृष्टरूपसे अर्थात् अधिक से अधिक पल्यके असंख्यातवें भाग के जितने समय हैं उतनी बार छोड़-छोड़कर पुनः ग्रहण कर सकता है, पश्चात् नियमसे सिद्धपदको प्राप्त होता है।