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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५६२ अर्थ – चारोंगतिके जीवोंमें ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है, किन्तु इतनी विशेषता है कि मनुष्यगतिमें क्षपकअनिवृत्तिकरणके ५३ प्रकृतिके क्षयप्ते पूर्वतक होता है। मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च व मनुष्यके ८८-८४ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होते हैं, क्योंकि 'सपदे उप्पण्णठाणेवि' इस गाथाके अनुसार एकेन्द्रियादिकमें जहाँ देवद्विककी उद्वेलना होती है वहाँ भी ऐसी सत्ता पाई जाती है तथा जो जीव मरणकर तिर्यञ्च या मनुष्यमें जहाँ भी उत्पन्न हो वहाँ भी इनकी सत्ता पाई जाती है। मिथ्यादृष्टितिर्यञ्चके ही ८२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है क्योंकि मनुष्यद्विककी उद्वेलना तेजकाय-वायुकाय जीवोंके होती है वहाँ भी इसवी शशा तथा बह-मरण करका तिर्वज्यों में ही उप होता वहाँ भी इसप्रकारकी सत्ता है, क्योंकि यह मरण करके तिर्यञ्चके अतिरिक्त अन्यत्र उत्पन्न नहीं होता है। सीदादिचउट्ठाणा तेरसखवगादु अणुवसमगेसु। गयजोगस्स दुचरिमं जाव य चरिमम्हि दसणवयं ।। ६२.२ ।। अर्थ - ८०-७९-७८ और ७.७ प्रकृतिरूप चारसत्त्वस्थान क्षपक अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें १३ प्रकृतियोंका जहाँ क्षय होता है वहाँसे अयोगीगुणस्थानके द्विचरमसमयपर्यन्त पाए जाते हैं और १० व ९ प्रकृतिक सत्त्वस्थान अयोगकेवलीके चरमसमय में होता है। चारों गतियोंमें नामकर्मसम्बन्धी सत्त्वस्थानोंकी सन्दृष्टि-- सत्त्वस्थानगत विशेष विवरण क्रमांक प्रकृतिसंख्या असंयतसम्यग्दृष्टि देव एवं चौथे से ११वें गुणस्थानवर्ती मनुष्यके सासादनगुणस्थानको छोड़कर चारोंगतिके जीवोंमें। सम्यग्दृष्टिदेव, सभ्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि मनुष्य या नारकीके । मनुष्यके अनिवृत्ति करणगुणस्थानमें जहाँ १३ प्रकृतियोंका क्षय होता है वहाँ और उससे पूर्व-पूर्व गुणस्थानोंमें अथवा चारोंगतिमें यह सत्त्वस्थान होता है। मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च अथवा भनुष्यके ये दोसत्त्वस्थान पाये जाते हैं। सत्वस्थानका मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्चके।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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