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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५५८
९२-१३ उपर्युक्त ।
९१-१३ उपर्युक्त ।
९०-१३ उपर्युक्त ।
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(मनुष्यद्विक, पञ्चेन्द्रिय, सुभग, त्रस, बादर, पर्याप्त, आदेय, यशस्कीर्ति और तीर्थङ्कर)
९ (१० - १ तीर्थकर )
अथानन्तर उद्वेलनारूप स्थानोंमें जो विशेषता है उसको कहते हैं
गुणसंजदप्पयडिं मिच्छे बंधुदयगंधहीणम्मि । सुव्वेल्लणपयडिं नियमेणुव्वेल्लदे जीवो ॥६१२ ॥
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अर्थ - मिथ्यात्व गुणस्थानमें जिन प्रकृतियों के बंध की अथवा उदय की वासना (गंध) भी नहीं है, ऐसी सम्यक्त्व आदि गुण से उत्पन्न हुई - सम्यक्त्व - सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी उद्वेलना (आहारकद्विककी भी उद्वेलना) मिथ्यात्वगुणस्थानमें होती है और शेष प्रकृतियोंकी उद्वेलना वह जीव करता है जिसके उन प्रकृतियोंका बंध अथवा उदयकी वासना भी नहीं है।
विशेषार्थ - असंयतजीवके आहारकद्विकका बन्ध व उदय नहीं है, वह आहारकद्विककी उद्वेलना करता है। एकेन्द्रिय व विकलत्रयके देवद्विक, नरकद्विक व वैक्रियिकद्विकका बन्ध व उदय नहीं है अतः वे जीव वैक्रियिकषट्ककी उद्वेलना करते हैं। इसीप्रकार तेजकायिक वायुकायिकजीवके विषयमें भी जानना ।
अब उन प्रकृतियोंका उद्वेलनक्रम कहते हैं
सत्यत्तादाहारं पुत्रं उब्वेल्लदे तदो सम्मं ।
सम्मामिच्छं तु तदो एगो विगलोय सगलोय ।। ६१३ ।।
अर्थ - आहारकद्विक प्रशस्तप्रकृति है अतः चारों गति के मिथ्यादृष्टि जीव पहले इन दोनों की उद्वेलना करते हैं, तत्पश्चात् सम्यक्त्वप्रकृतिकी उसके बाद सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी उद्वेलना करते हैं। उसके पश्चात् एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और सकलेन्द्रिय जीव शेष देवद्विकादिकों की उद्वेलना करते हैं। नोट धवलाकार वीरसेनस्वामीके मतानुसार आहारकद्विककी उद्वेलना असंयममें आते ही होती है।
१. सत्कर्षिक संयत असंयमको प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्त में उद्वेलना प्रारम्भ करता है जबतक वह असंयत है और जबतक सत्कर्म से रहित है तबतक उद्वेलना करता है। (ध.पु. ९६ पृ. ४९८ )