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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५३७ आगे नानाजीवोंकी अपेक्षा सम्भव एक-एक जीवके एक-एक समयमें नामकर्म के उदय स्थानोंको कहते हैं
वीसं इगिचउवीसं तत्तो इगितीसओत्ति एयधियं ।
उदयट्ठाणा एवं णव अट्ठ य होंति णामस्स ।।५९२ ॥ अर्थ - नामकर्मके २०-२१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३० और ३१ तथा ८ व ९ प्रकृतिरूप १२ उदयस्थान हैं।
- अब उपर्युक्त उदयस्थानोंके स्वामिर्याका कथन करते हैंचदुगदिया एइंदी विसेसमणुदेवणिरयएइंदी । इगिबितिचपसामण्णा विसेससुरणारगेइंदी ॥५९३ ॥ सामण्णसयलवियलविसेस मणुस्ससुरणारया दोण्हं। सयलवियलसामण्णा सजोगपंचक्खवियलया सामी ।।५९४ ।। जुम्मं ।
अर्थ -- २१ प्रकृतिरूप स्थानके स्वामी चारोंगतिके जीव हैं, २४ प्रकृतिक स्थानके स्वामी एकेन्द्रियजीव, २५ प्रकृतिक स्थानके स्वामी विशेषमनुष्य अर्थात् आहारकद्विकवाले मनुष्य तथा देव, नारकी व एकेन्द्रियजीव हैं, २६ प्रकृतिक स्थानके स्वामी एकेन्द्रिय तथा द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय
और पञ्चेन्द्रियसामान्य (उद्योत-तीर्थङ्कर व आहारकद्विकरहित) जीव हैं, २७ प्रकृतिक स्थानके स्वामी (आहारकद्विकसहित) मनुष्य तथा देव, नारकी व एकेन्द्रियजीव हैं, २८ और २९ प्रकृतिरूप स्थानके स्वामी सामान्यमनुष्य तथा पञ्चेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, विशेषमनुष्य, देव और नारकीजीव हैं तथा ३० प्रकृतिक स्थानके स्वामी मनुष्य व त्रस तिर्यञ्च हैं। ३१ प्रकृतिक स्थानके स्वामी सयोगकेवली तथा पञ्चेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय व चतुरिन्द्रि तिर्यञ्च जीव हैं, ८ व ९ प्रकृतिरूप स्थानोंके स्वामी अयोगकेवली हैं।
विशेषार्थ – गाथा ५८८ में कथित २१ प्रकृतिरूप स्थानका उदय कार्मणशरीरसहित चारोंगतिसंबंधी विग्रहगतिमें होता है अन्यत्र नहीं तथा गाथा ५८९ में कथित २४ प्रकृतिरूप स्थान एकेंद्रियके अपर्याप्तावस्थामें मिश्रयोग होते ही उदय होता है अन्यत्र नहीं, क्योंकि इनमें अनोपाज व संहनन नहीं है। इन २४ प्रकृतियोंमें परघातप्रकृति मिलानेपर एकेंद्रियकी शरीरपर्याप्निमें उदययोग्य २५ प्रकृतिका स्थान होता है अथवा आहारक अंगोपांग मिलानेपर विशेषमनुष्यके आहारकशरीरके मिश्रकालमें
१. प्रा.पं.सं.पृ. ३४९ गाथा ९७ भी देखो।