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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१९ अब छहसंहननवाले जीव किस-किस संहननसे कौन-कौनसी गति में उत्पन्न होते हैं यह ४ गाथाओं में कहते हैं -
सेवट्टेण य गम्मइ, आदीदो चदुसु कप्प जुगलोत्ति |
तत्तो दुजुगलजुगले, खीलियणारायणद्धोत्ति ॥२९॥ अर्थ - सृपाटिकासंहनन से सहित जीव स्वर्ग में उत्पन्न हो तो सौधर्मयुगल से चौथे लान्तवकापिष्ठ स्वर्गयुगलपर्यन्त अर्थात् आठवें स्वर्गतक उत्पन्न होते हैं। कीलक संहननवाले इनसे ऊपर दो युगल तक अर्थात् बारहवें स्वर्ग तक तथा अर्धनाराचसंहननवाले जीव इनसे आगे दो युगल अर्थात् १६ वें स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं।
णवगेविज्जाणुद्दिसणुत्तरवासीसु जांति ते णियमा।
तिदुगेगे संघडणे, णारायणमादिगे कमसो॥३०॥ अर्थ - नाराच, वज्रनाराच और वज्रर्षभनाराचसंहननवाले मनुष्य नवग्रैवेयकपर्यंत तथा वज्रनाराच, वज्रर्षभनाराचवाले मनुष्य नवअनुदिशविमानों तक एवं वज्रर्षभनाराचसंहननवाले मनुष्य पञ्चअनुत्तरविमानों तक उत्पन्न होते हैं।
सण्णी छस्संहडणो, वज्जदि मेयं तदो परं चापि।
सेवट्टादीरहिदो, पण पणचदुरेगसंहडणो॥३१॥ अर्थ - छहसंहननवाले सैनीजीव यदि नरक में उत्पन्न हों तो मेघानामक तीसरेनरकपर्यंत जाते हैं। सृपाटिकाबिना शेष कीलित आदि पाँचसंहनन वाले अरिष्टानामक पञ्चम पृथ्वीपर्यंत जाते हैं। अर्धनाराचादिक चारसंहननवाले मघवीनामक छठी पृथ्वीपर्यंत और वज्रर्षभनाराचसंहननवाले माधवीनामक सप्तमपृथ्वीपर्यन्त जाते हैं।
अंतिमतियसंहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमिमहिलाणं।
आदिमतिगसंहडणं, णस्थित्ति जिणेहिं णिद्दिद्वं ॥३२ ।। अर्थ - कर्मभूमि में महिलाओं के अन्तिम तीन संहनन होते हैं। आदि के तीन उत्तमसंहनन नहीं होते, ऐसा जिनेन्द्र भगवान ने कहा है।