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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५१७ अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त चारगुणस्थानोंको प्राप्त होता है। सासादनगुणस्थानवर्ती मिथ्यात्वको एवं मिश्रगुणस्थानवर्ती मिथ्यात्व और असंयतगुणस्थानको प्राप्त होता है। असंयत व देशसंयतगुणस्थानवर्ती प्रमत्तगुणस्थानके बिना अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त पाँच गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं अर्थात् असंयतसम्यग्दृष्टिजीव मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, देशसंयत और अप्रमत्त इन पाँच गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं तथा देशसंयतगुणस्थानवाले मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, असंयत और अप्रमत्तगुणस्थानको प्राप्त होते हैं। प्रमत्तगुणस्थानवर्तीजीव मिथ्यात्व से अप्रमत्तपर्यन्त छहगुणस्थानोंको तथा अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती एक मात्र प्रमत्तगुणस्थानको प्राप्त होता है और 'दु' शब्दसे अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती यदि उपशम और क्षपक श्रेणीपर आरोहण करता है तो अपूर्वकरणगुणस्थानको प्राप्त होता है। अप्रमत्तजीव मरणकरके देव असंयत होकर चतुर्थगुणस्थान को भी प्राप्त करता है, ऐसा समझना । SP उवसामगा दु सेटिं, आरोहंति य पडंति य कमेण । सासु परिदो देवतं समहियई ॥ ५५९ ॥ अर्थ - अपूर्वकरणादि गुणस्थानवर्ती उपशमश्रेणीवालेजीव उपशमश्रेणीमें आरोहण ( चढ़ना) एवं अवरोहण ( उतरना ) क्रमसे ही करते हैं। अतः आरोहणकी अपेक्षा ऊपरका एकगुणस्थान तथा अवरोहणकी अपेक्षा नीचेका एक गुणस्थान ऐसे दो गुणस्थान और उपशमश्रेणिमें मरणकी अपेक्षा चतुर्थगुणस्थान भी होता है, क्योंकि उपशमश्रेणिमें मरणको प्राप्त जीव देव असंयत होते हैं। इसप्रकार उपशमश्रेणिमें होनेवाले अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती जीवोंके तीन-तीन गुणस्थान होते हैं । उपशमश्रेणी पर आरोहण करनेवाला उपशान्तकषायगुणस्थानसे आगे नहीं बढ़ता अतः वहाँ गिरने की अपेक्षा सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान एवं मरण हो जावे तो देवअसंयत होनेसे चतुर्थगुणस्थान इसप्रकार दो गुणस्थान उपशान्तकपायवर्तीजीवके होते हैं। विशेषार्थ - यहाँ गतिकी अपेक्षा नारकी मिथ्यादृष्टि तो मिश्र व असंयत गुणस्थानको, सासादनगुणस्थानवाला मिथ्यात्वको मिश्रगुणस्थानवर्ती मिथ्यात्व तथा असंयतको, असंयतगुणस्थानवाला मिथ्यात्व-सासादन व मिश्रको प्राप्त होता है। तिर्यञ्चमिध्यादृष्टि मिश्र असंयत और देशसंयतगुणस्थानको; सासादनवर्ती मिथ्यात्वको; मिश्रगुणस्थानवाला मिथ्यात्व एवं असंयतको; असंयतगुणस्थानवर्ती देशसंयतपर्यन्त चारगुणस्थानोंको तथा देशसंयत्तगुणस्थानवाला चार गुणस्थानोंको प्राप्त होता है। मनुष्य मिथ्यादृष्टि सासादन व प्रमत्तके बिना अप्रमत्तपर्यन्त चार गुणस्थानोंको; सासादनवर्ती मिथ्यात्वको, मिश्रगुणस्थानवर्ती मिथ्यात्व असंयतको; असंयतवाला प्रमत्तबिना अप्रमत्तपर्यन्त पाँच गुणस्थानोंको; देशसंयतवर्ती प्रमत्तबिना अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त पाँच गुणस्थानोंको प्रमत्तवर्ती अप्रमत्तपर्यन्त छहको; अप्रमत्तवर्ती प्रमत्त व अपूर्वकरणको एवं मरण हो तो देव असंयतको; अपूर्वकरणवाला श्रेणी चढ़ते हुए अनिवृत्तिकरणको और उत्तरते हुए अप्रमत्तको तथा मरण होनेपर देव असंयतको प्राप्त होता है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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