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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५९६ भुजगारा अप्पदरा, अवट्टिदावि य सभंगसंजुत्ता । सव्वपरहाणेण य, णेदव्वा ठाणबंम्मि ॥५५४॥ अर्थ- पूर्वोक्त जो बन्धस्थान हैं वे भुजकार २२, अल्पतर २१. अवस्थित ४६ और च शब्दसे अवक्तव्यके ३ मूलभेदसे चारप्रकारके हैं। वे अपने-अपने भङ्गोंसे सहित नामकर्मके बन्धस्थानोंमें स्वस्थान एवं परस्थान इन दोनोंके साथ अथवा सर्वपरस्थानोंके साथ लगाने चाहिए। अब उन स्वस्थानादिकोंका लक्षण कहते हैं अप्पपरोभयठाणे, बंधट्ठाणाण जो दु बंधस्स । सट्ठाण परट्ठाणं, सव्वपरट्ठाणमिदि सण्णा ॥५५५॥ अर्थ- अपने विवक्षितगुणस्थानमें विचार आत्मस्थान, अन्यगुणस्थानकी अपेक्षा विचारपरस्थान, अन्यगति और अन्यही गुणस्थानरूप उभयस्थानकी अपेक्षा विचार सर्वपरस्थान इन तीनोंमें मिथ्यादृष्टि, ..असंयत व अपात्रले बताशजसम्बकी जो भुनाकारादि बन्ध हैं उनमें क्रमसे स्वस्थान भुजाकारादि, परस्थानभुजाकारादि और सर्वपरस्थानभुजाकारादि ये तीन नाम हैं। चदुरेक्कदुपण पंच य, छत्तिगठाणाणि अप्पमत्तता। तिसु उवसमगे संतेत्ति य, तियतिय दोणि गच्छंति ।।५५६॥ अर्थ- मिथ्यात्वगुणस्थानसे अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त के जीव अपने-अपने गुणस्थानोंको छोड़कर क्रमसे चार, एक, दो, पाँच, पाँच, छह और तीन गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं। अपूर्वकरणादि तीनगुणस्थानवीजीव उपशमश्रेणी में पाए जानेवाले तीन-तीनगुणस्थानों को तथा उपशान्तकषायगुणस्थानवाले जीव दोगुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं। किस-किस गुणस्थानवर्तीजीव किस-किस गुणस्थानको प्राप्त होता है सासणपमत्तवजं, अपमत्तंतं समल्लियइ मिच्छो। मिच्छत्तं बिदियगुणो, मिस्सो पढमं चउत्थं च ।।५५७ ।। अविरदसम्मो देसो, पमत्तपरिहीणमप्पमत्तंतं । छट्ठाणाणि पमत्तो, छट्टगुणं अप्पमत्तो दु ।।५५८ ।। जुम्मं ।। अर्थ- मिथ्यात्वगुणस्थानवाला जीव सासादन और प्रमत्तगुणस्थानके बिना मिश्रसे
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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