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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५०४ सासादनगुणस्थानवर्ती भवनत्रिकदेव, कल्पवासिनोदेवियाँ व सौधर्मयुगलवाले देव तो पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्चगति-मनुष्यगतिसहित २९ प्रकृतिका अथवा पर्याप्ततिर्यंचगति-उद्योतसहित ३० प्रकृतिके स्थानको बाँधते हैं और सासादनगुणस्थानके कालको व्यतीतकर जब मिथ्यादृष्टि होते हैं तब इनके अपर्याप्नकालमें उपर्युक्त २९-३० प्रकृतिक स्थानोंके अतिरिक्त एकेन्द्रियपर्याप्तयुत २५ प्रकृतिका अथवा उद्योत-आतपसहित २६ प्रकृतिक स्थानका भी बन्ध होता है तथा सनत्कुमारसे सहस्रारस्वर्गपर्यन्त १० स्वर्गवासीदेव उपर्युक्त २९-३० प्रकृतिरूप दोनों स्थानोंको बाँधते हैं । आनतस्वर्गसे नवग्रैवेयकपर्यन्तके देव मनुष्यगतिसहित २९ प्रकृतिरूप स्थानका ही बन्ध करते हैं तथा सासादनकाल व्यतीत होनेपर मिथ्यादृष्टि होकर अपर्याप्त मिथ्यादृष्टिवत् स्थानोंको बाँधते हैं। भवनत्रिक से उपरिमप्रैवेयकपर्यन्त मिश्रगुणस्थानवर्ती और असंयतगुणस्थानवर्ती पर्याप्तभवनत्रिक, कल्पवासिनीदेवियाँ तो मनुष्यगतिसंयुक्त २१ प्रकृतिके स्थानको बाँधते हैं। वैमानिक (कल्पवासी) देव तीर्थङ्कररहित पूर्वोक्त २९ प्रकृतिके और तीर्थकरसहित ३० प्रकृतिक स्थानका बन्ध करते हैं। चक्षु-अचक्षुदर्शनमें नामकर्मके सभी बन्धस्थान हैं। चक्षुदर्शनसहित नारकी २९-३० प्रकृतिके दो स्थानोंको बाँधते हैं, चतुरिन्द्रियजीव २८ प्रकृतिके स्थानबिना तिर्यञ्च-मनुष्यगतियुत २३-२५-२६२९ और ३० प्रकृतिरूप ५ स्थानोंको बाँधता है। पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च २३-२५-२६-२८-२९-३० प्रकृतिरूप छह स्थानोंका बन्ध करता है, मनुष्य सभी स्थानोंको बाँधते हैं। देव यथायोग्य २५-२६-२९ व ३० प्रकृतिके स्थानोंका बन्ध करते हैं। अचक्षुदर्शनसहित नारकी चक्षुदर्शनवत् दो स्थानोंको और एकेन्द्रियसे चतुरिन्द्रियपर्यन्तके जीव नरक या देवगतियुत २८ प्रकृतिक स्थानबिना शेष २३-२५-२६-२९-३० प्रकृतिरूप ५ स्थानों को, पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च २८ प्रकृतिक स्थानसहित छहस्थानों को, मनुष्य सभी बन्धस्थानोंको एवं देव चक्षुदर्शनवत् यथायोग्य २५-२६-२९ व ३० प्रकृतिरूप चार स्थानोंका बन्ध करते हैं। अवधिदर्शनमें अवधिज्ञानवत् अन्तिम ५ बन्धस्थान हैं। असंयत देव-नारकीमें और असंयतदेशसंयतवर्ती सञीपर्याप्ततिर्यञ्चोंमें, असंयतगुणस्थानसे क्षीणकषायपर्यन्तगुणस्थानवाले मनुष्योंमें देशावधिज्ञान है और प्रमत्तसे क्षीणकषायगुणस्थानवी चरमशरीरी जीवोंके परमावधि-सर्वावधिज्ञान पाया जाता है। अवधिदर्शनके धारक धर्मादि तीन नरकवाले तीर्थंकर व मनुष्यगतियुत ३० प्रकृतिक स्थानको और तीर्थङ्करके सत्त्वरहित अञ्जनादिपृथ्वीवाले नारकी मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिक स्थानको बाँधते हैं तथा तिर्यञ्चजीव देवगतिसंयुक्त २८ प्रकृतिक स्थानको बाँधते हैं। मनुष्य भी देवगतिसंयुक्त २८ प्रकृतिकस्थानसे १ प्रकृतिक स्थानपर्यन्त (२८-२९-३०-३१-१) पाँच स्थानोंको, सौधर्मादिकस्वर्गके देव तीर्थङ्करप्रकृतिके सत्त्वसहित मनुष्यगतियुत ३० प्रकृतिरूप और भवनत्रिक आदि सभीदेव तीर्थकररहित मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिरूप स्थानको बाँधते हैं। केवलदर्शनमें केवलज्ञानवत् बन्धका अभाव है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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