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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५०३ तिर्यञ्च व मनुष्यमतियुत २३-२५-२६-२९ और ३० प्रकृतिरूप पाँचस्थान बँधते हैं, किन्तु पर्याप्तमनुष्यके चारोंगतिसहित छहों स्थान पाए जाते हैं। 'चदुगति मिच्छोसणी' इत्यादि लब्धिसार गाथा २ में कथित सामग्रीसहित जीव ने करणलब्धि के चरमसमयमें दर्शनमोहका उपशम करके प्रथमोपशमसम्यक्त्व प्राप्त किया तथा प्रथमोपशमसम्यक्त्वसहित देशव्रती अथवा महाव्रती होकर इस उपशमसम्यक्त्व के अन्तर्मुहूर्त कालमें एकसमयसे छहआवली कालपर्यंत अनंतानुबन्धीका जो अप्रशस्त उपशम हुआ था उसमें से किसी भी एक क्रोधादिकषायका उदय होनेपर प्रथमोपशमसम्यक्त्वका घातकरके सासादनगुणस्था हुवा तो मिथ्यात्वावस्थामें ही बन्ध है अतः पञ्चेन्द्रियपर्याप्त तिर्यंचमनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिके स्थानको तिर्यञ्च - उद्योतयुत ३० प्रकृतिक स्थानको एवं देवगतिसहित २८ प्रकृतिके स्थानको बाँधता है। मरण होनेपर तिर्यञ्च व मनुष्य अथवा देव अपर्याप्तकालमें यदि सासादनगुणस्थानवर्ती हैं तो तिर्यञ्च व मनुष्यगतियुत २९ व तिर्यञ्च - उद्योतसंयुक्त ३० प्रकृतिरूप दो स्थानोंको बाँधते हैं, किन्तु नरकगति या देवगतिसहित २८ प्रकृतिक स्थानको नहीं बाँधते हैं। सासादनगुणस्थानसम्बन्धी काल पूर्ण होनेपर मिथ्यादृष्टि होकर यावत्कालपर्यन्त निर्वृत्त्यपर्याप्तावस्था अवशेष रहती है उसमें २५-२६-२९ और ३० प्रकृतिरूप चारस्थानोंको बांधते हैं। तथा पर्याप्त अवस्था में २८ प्रकृतिसहित छह स्थानोंको बाँधते हैं। कर्मभूमिज मिश्र व असंयतगुणस्थानवर्ती मनुष्य तथा भोगभूमिज सर्वमनुष्य देवगतियुत २८ प्रकृतिको ही बाँधता है, क्योंकि नरकतिर्यञ्चगतिकी सासादनगुणस्थान में ही व्युच्छिति हो जाती है। असंयत्तगुणस्थानवर्ती तीर्थङ्करप्रकृतिकी सत्तावाला मनुष्य, देवगति व तीर्थङ्करसहित २९ प्रकृतिके स्थानको बाँधता है। पर्याप्तावस्थामें भवनत्रिक व सौधर्मयुगलवाले मिध्यादृष्टिदेव एकेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्चगतिसहित २५ प्रकृतिका, आतप उद्योतयुत २६ प्रकृतिका, पञ्चेन्द्रियपर्याप्तत्तिर्यञ्च मनुष्यगतिसंयुक्त २९ प्रकृतिका, तिर्यञ्च उद्योतसहित ३० प्रकृतिका इसप्रकार चारस्थानका बन्ध करते हैं। सनत्कुमारादि १० स्वर्गवाले मिथ्यादृष्टिदेव मनुष्य व तिर्यञ्चगतिसहित २९ और तिर्यञ्चगति व उद्योतसहित ३० प्रकृतिक स्थानको बाँधते हैं तथा आनतादि ४ स्वर्गवाले एवं नवग्रैवेयकवासीदेव मनुष्यगतिसहित २९ प्रकृतिके स्थानको बाँधते हैं। निर्वृत्त्यपर्याप्तमिथ्यादृष्टि भवनत्रिकदेव और कल्पवासिनीदेवी, सौधर्म- ईशान - स्वर्गवाले देव एकेन्द्रियपर्याप्तसहित २५ प्रकृतिका तथा आतप या उद्योत के साथ पर्याप्ततिर्यंचसहित २६ का पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्च व मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिका और तिर्यञ्च उद्योतसहित ३० प्रकृतिका इसप्रकार चारस्थानों का बन्ध करते हैं। उसीप्रकार सनत्कुमारस्वर्गसे सहस्रारस्वर्गपर्यन्तके देव पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यंच व मनुष्यगतियुत २९ प्रकृतिका और तिर्यञ्च उद्योतसहित ३० प्रकृतिका बन्ध करते हैं। आनतस्वर्गसे उपरिमग्रैवेयकतकके देव मनुष्यगतिसहित २९ प्रकृतिका ही बन्ध करते हैं, क्योंकि तिर्यञ्चगतिसहित २९ ३० प्रकृतिक बन्धस्थान यहाँ नहीं हैं। इसप्रकार संक्षेपसे असंयमसहित मिथ्यादृष्टिजीवके देवगतिकी अपेक्षा नामकर्मबन्धस्थानोंका कथन हुआ । यहाँ जीवसमास, पर्याप्ति, प्राणादिकी विवक्षासे ग्रन्थविस्तारके भयसे कथन नहीं किया है इसका कथन परमागमसे यथायोग्य जानना चाहिए।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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