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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५०५
कम्मं वा किण्हतिये, पणुवीसाछक्कमट्टवीसचऊ । कमसो तेऊ जुगले, सुक्काए ओहिणाणं वा ॥ ५४९ ।।
अर्थ- कृष्णादि तीन अशुभलेश्याओंमें कार्मणकाययोगवत् २३-२५-२६- २८-२९ और ३० प्रकृतिरूप ६ बन्धस्थान हैं। तेज (पीत) और पद्मलेश्यामें क्रमसे २५ २६ २८ २९ ३० और ३१ प्रकृतिरूप ६ स्थान हैं तथा २८ २९ ३० ३१ प्रकृतिरूप चारस्थान हैं। शुक्ललेश्यामें अवधिज्ञानवत् २८-२९-३०-३१ और प्रकृतिरूप पाँच स्थान है।
विशेषार्थ - वर्णनामा नामकर्मके उदयसे शरीरके वर्णरूप द्रव्यलेश्याको यहां ग्रहण नहीं किया है। मोहनीयकर्मके उदय-उपशम या क्षय अथवा क्षयोपशमसहित जौवकी योगरूप चंचलता भावलेश्या है उसको यहाँ ग्रहण किया गया है। कृष्णादिके भेदसे लेश्या ६ प्रकारकी है। नरकोंमें तीन अशुभलेश्या ही हैं।' नरकोंमें उत्पन्न हुए जीव शरीरपर्याप्ति पूर्ण होनेपर अथवा नहीं होनेपर तिर्यञ्च व मनुष्यगतियुत
१. नारकियों के लेश्या :
शंका- कर्मकाण्ड हस्तलिखित टीका पं. टोडरमलजी पृ. ८२२ – “यद्यपि नरक विषै नियमर्ते अशुभ लेश्या है तथापि तहाँ तेजोलेश्या पाइये है, जिस लेश्या के मन्द उदय होते प्रथम स्पर्द्धक प्राप्त होता है" इसमें तेजोलेश्या बतलाई है लेकिन तेजोलेश्या नरक में कहाँ सम्भव है? यह समझ में नहीं आता क्योंकि नरक में तो तीनों अशुभ लेश्या पाई जाती हैं इसलिये कृपया इसका समाधान करिये ।
समाधान- श्री पुष्पदन्त भूतबलि के मतानुसार नरक में तेजोलेश्या नहीं होती है। लेश्या का लक्षण इस प्रकार है - आत्मप्रवृत्ति संश्लेषकरी लेश्या अथवा लिम्पतीति लेश्या । अर्थ: आत्मा और प्रवृत्ति (कर्म) का संश्लेषण अर्थात् संयोग करने वाली लेश्या कहलाती है अथवा जो (कर्मों से आत्मा का) लेप करती है वह लेश्या है। (ष. खं. पु. ७ पत्र ७) । कृष्ण, नॉल और कापोतलेश्या का उत्कृष्ट काल साधिक तैंतीस सत्तरह व सात सागर क्रमश: कहा है। क्योंकि तिर्यंचों या मनुष्यों में कृष्ण, नील व कापोत लेश्या सहित सबसे अधिक अन्तर्मुहूर्तकाल रहकर फिर तैंतीस सत्तरह व सात सागरोपम आयु स्थितिवाले नारकियों में उत्पन्न होकर कृष्ण, नील व कापोतलेश्या के साथ अपनी-अपनी आयु स्थिति प्रमाण रहकर वहाँ से निकल अन्तर्मुहूर्त काल उन्हीं लेश्याओं सहित व्यतीत करके अन्य अविरुद्ध लेश्या में गए हुए जीव के उक्त तीन लेश्याओं का दो अन्तर्मुहूर्त सहित क्रमश: तैंतीस सत्तरह व सात सागरोपम काल पाया जाता है। अतः इस कथन के अनुसार नरकों में अन्य लेश्यारूप परिवर्तन नहीं होता। इस कारण वहाँ पर तेजोलेश्या सम्भव नहीं है।
गोम्मटसार जीवकाण्ड के अनुसार- जिसके द्वारा जीव अपने को पुण्य-पाप से लिप्त करे उसे लेश्या कहते हैं (गाथा ४८८ ) । नरक में कापोत, नील व कृष्ण से तीन अशुभ लेश्या प्रथमादि पृथ्वियों में होती हैं। यह स्वामी अधिकार का कथन भावलेश्या की अपेक्षा से है। (गाथा ५२८) । कृष्णरलेश्या का उत्कृष्टकाल तैंतीससागर, नीललेश्या का सत्तरहसागर, कापोत लेश्या का सातसागर है। यह उत्कृष्टकाल नरक में होता है क्योंकि सातवें नरक में तैंतीस सागर, पाँचवें नरक में सत्तरह सागर और तीसरे नरक में सातसागर उत्कृष्ट आयु होती है (गाथा ५५१) । इससे भी स्पष्ट है कि नरक में आयु पर्यंत अपनी-अपनी ही लेश्या रहती है। एक लेश्या पलटकर दूसरी लेश्या नहीं हो जाती है। लेश्याओं में दो प्रकार का संक्रमण है— ( १ ) स्वस्थान संक्रमण (२) परस्थान संक्रमण । नरकों में परस्थान संक्रमण नहीं होता है । स्वस्थान संक्रमण में षट्स्थानपतित हानिवृद्धि होती है। नारकियों में अपनी-अपनी लेश्याओं का षट्स्थानरूप स्वस्थान संक्रमण सम्भव है जो अन्तर्मुहूर्त बाद होता रहता है (गाथा ५०३-५०५) । कहीं पर इस षट्स्थान परिवर्तन को इन शब्दों में भी लिख दिया है भावलेश्यास्तु प्रत्येकमन्तर्मुहूर्त परिवर्तिन्यः । गो.जी. गाथा ४९५ में सम्पूर्ण नारकियों के कृष्ण वर्ण द्रव्यलेश्या कहीं है, किन्तु सर्वार्थसिद्धि व तत्त्वार्थराजबार्तिक में कृष्ण, नील और कापोत तीनों द्रव्य लेश्या नारकियों के कही गई हैं। (पं. रतनचन्दमु. व्य. ३२१-२२))