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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४९८ विशेषार्थ- एकेन्द्रिय व विकलेन्द्रियजीवोंमें २३, २५, २६, २९, ३० प्रकृतिक नामकर्मके ये ५ बन्धस्थान होते हैं । स्थावरकायमें भी इसीप्रकार ५ बन्धस्थान हैं। पंचेन्द्रिय और उसकायमें २३, २५, २६, २८, २९, ३०, ३१ व १ ये आठ बन्धस्थान हैं। इसीप्रकार चार मनोयोगियों व चार वचनयोगियों तथा औदारिककाययोगियों में उक्त ८ बन्धस्थान जानने। वैक्रियिक व वैक्रियिकमिश्र काययोगियोंमें देवगतिके समान २५, २६, २९ व ३० प्रकृतिक चार बन्धस्थान होते हैं। (प्रा.पं.स.पृ. ४९६-५००) अडवीसदु हारदुगे, सेसदुजोगेसु छक्कमादिल्लं । वेदकसाये सव्वं, पढमिल्लं छक्कमण्णाणे ॥५४६ ॥ अर्थ- आहारक-आहारकमिश्रकाययोग, २८-२९ प्रकृतिक दोस्थान हैं। शेष कार्मण और औदारिकमिश्रकाययोग इन दो योगोंमें आदिके ६ स्थान हैं। पुरुषादि तीनवेद तथा क्रोधादि चारों कषायोंमें सर्व बन्धस्थान हैं। ज्ञानमार्गणामें तीन कुज्ञानोंमें आदिके छह बन्धस्थान हैं। विशेषार्थ- आहारक-आहारकमिश्रकाययोगमें देवति तथा आहारकद्विकसहित स्थान नहीं होता क्योंकि इनका बंध अप्रमत्त तथा अपूर्वकरणगुणस्थानमें ही सम्भव है, किन्तु आहारकद्विक प्रमत्तगुणस्थानमें नहीं होता है तथा कार्मण और औदारिकमिश्रसहित मिथ्यादृष्टितिर्यञ्च-मनुष्यमें २८ प्रकृतिक स्थानका बन्ध नहीं है, क्योंकि 'कम्मे उरालमिस्सं' इस सूत्रसे देवद्विक और नरकद्विकके बन्धका कार्मण व औदारिक मिश्रकाययोगमें अभाव है। कार्मणकाययोगसहित सासादनगुणस्थानवर्तीतिर्यञ्च-मनुष्यमें एकेन्द्रियबादर-सूक्ष्मपर्याप्त और अपर्याप्तसहित २३-२५ व २६ का एवं नरक-देवगतिसहित २८ का तथा विकलत्रयसंयुक्त २९-३० प्रकृतिकस्थान इन सर्व स्थानोंके बिना अवशेष तिर्यञ्चपचेन्द्रिय व मनुष्यगतिसहित २९-३० प्रकृतिक दो बन्धस्थान हैं। यहाँ "मिच्छदुगेदेवचऊ तित्थं णहि" इस वचनसे देवगतिसहित २८ प्रकृतिक स्थानका अभाव है। कार्मणकाययोगसहित असंयतमनुष्यमें देवगति व तीर्थंकरसहित २९ प्रकृतिकस्थान भी जानना। तीनोंवेदों में और चारोंकषायोंमें सर्व बन्धस्थान हैं। विशेष यह है कि नपुंसकवेदमें २९-३० प्रकृतिके दोस्थान तृतीयनरकपर्यन्त जानना । नपुंसकवेदसहित तिर्यंचगतिमें एकेन्द्रियबादरसूक्ष्मअपर्याप्तसहित २३ प्रकृतिका, एकेन्द्रियबादर-सूक्ष्मपर्याप्तसंयुक्त २५ प्रकृतिका, सअपर्याप्तद्वीन्द्रियत्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-पंचेन्द्रियतिर्यञ्च-मनुष्यगतिसहित २५ प्रकृतिका, एकेन्द्रियबादरपर्याप्त आतप व १. प्रा.पं.सं.पृ.५०१। २. २३, २५,२६. २८, २९, ३० प्रकृतिक ये ६ बन्धस्थान (पं.सं.पृ. ५००, ५०१) ३. २३, २५, २६, २८, २९, ३०, ३१ व १ प्रकृतिक आठबन्धस्थान हैं। (पं.स.पू. ५०२)। ४. २३, २५, २६, २८, २९, ३० ये छहबन्धस्थान (प.सं.पू. ५०२)।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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