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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ४९६
आहारा दु देवे, देवाणं सण्णिकम्मतिरियणरे । पत्तेयपुढविआऊ बादरपज्जत्तगे गमणं ।। ५४२ ।। भवतियाणं एवं, तित्थूणणरेसु चेव उप्पत्ती । ईसाणताणेगे, सदरदुगंताण सण्णीसु ।।५४३ ।। जुम्मं ॥
अर्थ- आहारकशरीरसहित प्रमत्तगुणस्थानवाले जीव मरणकरके वैमानिकदेवों में ही उत्पन्न होते हैं तथा सर्वार्थसिद्धि विमानके देव मरणकरके पन्द्रह कर्मभूमिके चरमशरीरी मनुष्यों में ही उत्पन्न होते हैं, अन्यत्र नहीं, किन्तु सहस्रारस्वर्गपर्यन्तके देव कर्मभूमि के मनुष्यों में लवणोदधि, कालोदधि, स्वयंभूरमणद्वीपके उत्तरार्ध, स्वयंभूरमणसमुद्रवर्ती सञ्जीपर्याप्तजलचर, स्थलचर, नभचरतिर्यञ्चों में उत्पन्न होते हैं। ईशानस्वर्गपर्यन्तके देव पूर्वोक्त मनुष्य व तिर्यञ्चों में तथा बादरपर्याप्तपृथ्वी जलकाय, प्रत्येक वनस्पतिरूप एकेन्द्रियमें भी उत्पन्न होते हैं । भवनत्रिकदेवोंका कथन भी सौधर्मईशानवत् ही जानना | विशेष इतना है कि भवनत्रिकदेव मनुष्यों में तीर्थङ्करादिक त्रेसठशलाका पुरुषोंमें उत्पन्न नहीं होते हैं। इसप्रकार चारों गतिके जीवोंका संक्षेपसे गति आगतिका वर्णन किया। विशेषज्ञानके लिए धवल पु. ६ में गति - आगतिचूलिका देखनी चाहिए।
आगे चतुर्दश मार्गणाओंमें नामकर्मके बन्धस्थान आठ गाथाओंसे कहते हैं
णामस्स बंधठाणा, णिरयादिसु णवयवीस तीसमदो । आदिमछकं सव्वं पणछण्णववीस तीसं च ॥ ५४४ ॥
अर्थ - नामकर्मके बन्धस्थान नरकगतिमें तिर्यञ्च मनुष्यगतिसंयुक्त २९ ३० प्रकृतिके दो हैं । तिर्यञ्चगतिमें आदिके ६ बन्धस्थान, मनुष्यगतिमें सर्वस्थान तथा देवगति में २५-२६-२९ और ३० प्रकृतिरूप चार बन्धस्थान जानना चाहिए ।"
विशेषार्थ - नरकगतिमें नामकर्म के २९-३० प्रकृतिक दो बन्धस्थान हैं। उनमें पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्चगति तथा मनुष्यगतिसंयुक्त २९ प्रकृतिका स्थान पष्ठम मघवी पृथ्वीतकके जीव बांधते हैं। पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्च मतिसहित २९ प्रकृतिके अथवा उद्योतयुक्त ३० प्रकृतिक स्थानको सप्तम माघव पृथ्वीतक जीव बाँधते हैं। पर्याप्तमनुष्यगति व तीर्थंकरसंयुक्त ३० प्रकृतिके स्थानका बन्ध
१. “णिरए तीसुगुती बंधद्वाणाणि । " प्रा. पं.सं.नु. ४९३ गाथा ४१९ । " तिरियमई तेवीस पणवीस छब्बीसमवीसा व तीसूण तीस बंधा । " प्रा. पं.सं. पू. ४९४ गाथा ४२१ | मनुष्यगति में बन्धस्थान २३, २५, २६, २८, २९, ३०, ३१ और १ प्रकृतिक आठ होते हैं। देवगति में २५, २६, २९, ३० प्रकृतिक ये चार बन्धस्थान होते हैं । प्रा. पं. सं. ५.४९५ ।