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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१५
अनंत की संख्या ८ कल्पित की है। इस अनन्त (८) की संख्या का १०,८०० में भाग देने पर ५३५० प्राप्त हुआ। यह द्रव्य १७ सर्वघातिप्रकृतियों का है। अतः इस द्रव्य को १७ से भाग देने पर १३५० १७ = ७९ अर्थात् ८० के लगभग लब्ध आया वह प्रत्यक सर्वघाती का द्रव्य समझना। इतना ही द्रव्य मिथ्यात्वकर्म का भी है। १०,८७० में से १३५० (सर्वघातिद्रष्य) घटाने पर ९४५० प्रमाण द्रव्य देशघाती का है।
७९७ (लगभग ८०) के असंख्यातवें भाग सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति के परमाणु समझना तथा सम्यग्मिथ्यात्व के असंख्यातवें भाग प्रमाण परमाणु सम्यक्त्वप्रकृति के समझना, शेष असंख्यातबहुभागरूप परमाणु मिथ्यात्वप्रकृति के हैं। ताड़पत्रीय मूल गो. क, से उद्धृत सूत्र
चारित्तमोहणीयं दुविहं कसायवेदणीयं णो कसायवेदणीयं चेइ । कसायवेदणीयं सोलसविहं खवणं पडुच्च अणंताणुबंधि-कोह-माण-माया-लोहं अपच्चक्खाण-पच्चक्खाणावरण-कोह-माण-माया-लोहं, कोह-संजलण, माणसंजलण, माया-संजलण, लोह संजलण चेइ। पक्कमदव्वं पडुच्च अणंताणुबंधि लोहमाया-कोह-माणं, संजलण लोह-माया-कोह-माणं पच्चक्खाण-लोह-माया-कोहमाणं, अपच्चक्खाण लोह-माया-कोह-माणं चेड़। णोकसायवेदणीयं णवविहं पुरिसित्थिणउसयवेदंरदि-अरदि-हस्स-सोग-भय-दुगंछा चेदि । आउगं चउविहं णिरयायुगं, तिरिक्खमाणुस्स-देवाउगं चेदि। णामं बादालीसं पिंडापिंड पयडिभेयेणा गदि-जादि-सरीर-बंधणसंघाद-संठाण-अंगोवंग-संघडण-वण्णा-गंध-रस-फास-आणुपुव्वी-अगुरुलहुगुवघादपरघाद-उस्सास-आदाव-उज्जोद-विहायगदि-तस-थावर-बादर-सुहुम-पज्जत्तापज्जत्तपत्तेय-साहारणसरीर-थिराचिर-सुभासुभ-सुभग दुब्भग-सुस्सर-दुस्सर-आदेजाणादेज्ज जसाजसकित्ति-णिमिण-तित्थयरणामं चेदि। तत्थ गदिणामं चउविहं णिरयतिरिक्तमणुवदेवगदिणामं चेदि । जादिणामं पंचविहं एइंदिय-बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिदिय जादिणाम पंचिंदिय जादिणामं चेदि । सरीरणामं पंचविहं ओरालिय-वेगुब्बिय-आहार-तेज-कम्मइय सरीरणाम चेइ। सरीरबंधणणामं पंचविहं ओरालिय-वेगुम्विय-आहार-तेज-कम्मइय सरीरबंधणणामं चेइ।
सूत्रार्थ - चारित्रमोहनीयकर्म दो प्रकार का है - कषायवेदनीय, नोकषायवेदनीय | कषायवेदनीय १६ प्रकार का है। क्षपणा की अपेक्षा उनका क्रम इस प्रकार है - अनन्तानुबन्धीक्रोध-मान-माया-लोभ