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________________ प्रमत्त Pere ... गोगाएर कर्मकाण्ड-४८८ देशसंयत २८ व २९ प्रकृतिक २८ व २९ प्रकृतिक अप्रमत्त २८-२९-३० व ३१ प्रकृतिक अपूर्वकरण २८-२९-३० व ३१ छठेभागतक, ७वें भागमें १ प्र. अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसाम्पराय अब नामकर्मके पूर्वोक्त बन्धस्थान किस-किस कर्मपदसहित बँधते हैं, यह बात दोगाथाओं में कहते हैं ठाणमपुण्णेण जुई, पुण्णेण य उवरि पुण्णगेणेव। तावदुगाणण्णदरेणपणदरेणमरणिरयाणं ।।५२२॥ णिरयेण विणा तिण्हं, एक्कदरेणेवमेव सुरगइणा। बंधति विणा गइणा, जीवा तजोगपरिणामा ॥५२३ ।। जुम्मं ॥ अर्थ- पूर्वगाथामें कहे हुए नामकर्मके आठ बन्धस्थानोंमें क्रमसे २३ प्रकृतिरूप स्थान अपर्याप्तसहित, २५ प्रकृतिकस्थान पर्याप्त और 'च' शब्दसे अपर्याप्तसहित भी बंधता है। २६ प्रकृतिका स्थान पर्याप्त तथा आतप-उद्योतमें से किसी एक प्रकृतिसहित, २८ प्रकृतिरूप स्थान देव अथवा नरकगतिसहित, २९ और ३० प्रकृतिकस्थान तिर्यञ्च, मनुष्य अथवा देवगतिसहित, ३१ प्रकृतिका स्थान देवगतिसहित और एक प्रकृतिरूप स्थान किसी भी गतिके साथ नहीं बँधता अर्थात् इस स्थानके साथ कोई भी गति नहीं बँधती है। इसप्रकार इन स्थानोंके योग्य परिणामवाले जीव इन स्थानोंको बाँधते आतप और उद्योत ये दो प्रशस्तप्रकृतियाँ पूर्वोक्त ४१ जीवपदोंमें किस जीवपदके साथ बन्धको प्राप्त होती हैं, यह कहते हैं भूवादरपज्जत्तेणादावं बंधजोग्गमुज्जोवं। तेउतिगूणतिरिक्खपसत्थाणं एयदरगेण ॥५२४॥ अर्थ-- आतपप्रकृति बादरपर्याप्तपृथ्वीकायसहित ही बन्ध योग्य है और उद्योतप्रकृति तेज-वायु और साधारणवनस्पति तथा अन्य सभी सूक्ष्मजीवोंके बिना बादरपर्याप्ततिर्यञ्चसम्बन्धी पुण्यप्रकृतियोंमें से किसी एक प्रकृतिके साथ बन्धयोग्य कही है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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