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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४८२ तेरस बारेयारं, तेरस बारं च तेरसं कमसो । पुरिसित्थिसंढवेदोदयेण गदपणगबंधम्हि ।।५१२ ॥ अर्थ- अनिवृत्निकरणगुणस्थानके जिस भागमें पुरुषवेद और चार सज्वलनकषाय इन ५ प्रकृतियों का बन्ध होता है उस भाग में पुरुषवेद के उदयसहित श्रेणी चढ़नेवाले जीवके १३-१२ और ११ प्रकृतिरूप तीन सत्त्वस्थान होते हैं। स्त्रीवेदके उदयसहित श्रेणोपर आरोहण करनेवालेके १३ व १२ प्रकृतिरूप दोस्थान तथा नपुंसकवेदके उदयसे श्रेणी चढ़नेवाले जीवके १३ प्रकृतिरूप स्थान है। विशेषार्थ- अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके प्रथमसमयसे पुरुषवेदकी बन्धव्युच्छित्ति होने तक चार संज्वलनकषाय और पुरुषवेदरूप पाँचप्रकृतिक बन्धस्थान मोहनीय कर्मका होता है। जो पुरुषवेदकेसाध क्षपकश्रेणी चढ़ा है उसके अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके प्रारम्भमें मोहनीयकर्मका ५३ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है, नपुंसकवेदका क्षय कर देनेपर मोहनीयकर्मका १२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है तथा स्त्रीवेद क्षय कर देनेपर मोहनीय कर्मका ११ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है। सवेदभाग के द्विचरमसमयमें छह नोकषायोंके साथ पुरुषवेदके सत्ता में स्थित पुराने कर्मोका नाश कर दिया है उसके यद्यपि सर्वेदभागके चरमसमयमें पाँचप्रकृतिक सत्त्वस्थान पाया जाता है, किन्तु उसके उस पुरुषवेदका बन्ध नहीं होनेसे चारप्रकृतिक बन्धस्थान पाया जाता हैं, क्योंकि माहनीयकमकी दो प्रकृति रूप (पुरुषवेद-एक संज्वलनकषाय) उदयस्थानमें पाँचप्रकृतिक (पुरुषवेद और चार सज्वलनकषाय) तथा चार प्रकृतिरूप (चार सज्वलनकषाय) दो बन्धस्थान एवं १३-१२ व ११ प्रकृतिरूप तीन सत्त्वस्थान बतलाए गए हैं। अतः मोहनीयकर्मके पाँचप्रकृतिक बन्धस्थान में पांचप्रकृतिक सत्त्वस्थान सम्भव नहीं हैं। जो स्त्रीवेदके साथ क्षपकश्रेणि चढ़ा है उसके अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके प्रारंभमें मोहनीयकर्मका १३ प्रकृतिक सत्त्वस्थान एवं नपुंसकवेदका क्षय हो जानेपर १२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है। जो नपुंसकवेदके साथ क्षपकश्रेणि चढ़ा है उसके सवेदभागके विचरमसमयमें स्त्रीवेदका क्षय होकर चरमसमयमें ५२ प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है किन्तु उस समय पुरुषवेदका बन्ध नहीं होने से पाँच प्रकृतिक बन्धस्थान नहीं पाया जाता। अत: नपुंसकवेदवालेके १३ प्रकृतिक एक सत्त्वस्थान होता है। पुरिसोदयेण चडिदे, अंतिमखंडंतिमोत्ति पुरिसुदओ। तप्पणिधिम्मिदराणं, अवगदवेदोदयं होदि ॥५१३॥ अर्थ- पुरुषवेदके उदयसहित श्रेणी चढ़नेवाले जीवके अन्तिमखण्डके चरमसमयपर्यन्त पुरुषवेदके . गो,क, गाथा ६६७। ३. जयधवल पु.२ पृ. २४६। १. जयधवल पु.२ पृ. २४३1 २ ४. गो,क, गाधा ४८४ का उत्तरार्ध ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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