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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४६३
आगे अपुनरुक्तस्थानों की तथा उनमें पाई जाने वाली प्रकृतियों की संख्या कहते हैं---
एक य छक्केयारं, दससगचदुरेक्कयं अपुणरुत्ता।'
एदे चदुवीसगदा, बार दुगे पंच एक्कम्मि ॥४८८ ।। अर्थ- दशप्रकृतिरूप एक स्थान, ९ प्रकृतिरूप छह स्थान, ८ प्रकृतिरूप ग्यारह स्थान, ७ प्रकृतिरूप दस स्थान, ६ प्रकृतिरूप सात स्थान, ५ प्रकृतिरूप चारस्थान और ४ प्रकृतिरूप एक स्थान अपुनरुक्त है। इन ४० स्थानों में प्रत्येक के २४-२४ भंग हैं। दो प्रकृति रूप स्थान के १२ भंग और एक प्रकृतिरूप स्थान के ५ भंग है।
विशेषार्थ- १० प्रकृतिरूप, ९ प्रकृतिरूप, ८ प्रकृतिरूप स्थान तो पूर्ववत् ही हैं, किन्तु ७ प्रकृति आदिरूप स्थानों में कुछ विशेषता है उसे ही यहाँ कहते हैं
पूर्व में ७ प्रकृतिरूप ११ स्थान कहे थे, किन्तु यहाँ ७ प्रकृतिरूप १० ही स्थान कहे हैं। इसका कारण यह है कि पूर्व में कहे हुए ११ स्थानों में पहले कटों में सम्यक्त्वप्रकृति सहित वेदकसम्यग्दृष्टि के प्रमत्त-अप्रमत्तगुणस्थान सम्बन्धी सात प्रकृतिरूप जो दो स्थान कहे थे, वे समान हैं अतः पुनरुक्त होने से यहाँ एक ही ग्रहण किया इसीलिए १० स्थान कहे गए हैं। तथैव पूर्व में ६ प्रकृतिरूप स्थान भी ११ कहे थे, किन्तु यहाँ पर ७ ही स्थान कहे हैं, क्योंकि पूर्वोक्त ११ स्थानों में वेदकसम्यक्त्वसहित पहले कूटों में छह प्रकृति रूप दो-दो कूट प्रमत्त-अप्रमत्तगुणस्थान सम्बन्धी कहे थे उनमें समानता होने से ४ में से दो कूट ग्रहण किए और शेष दो कूट पुनरुक्त होने से कम कर दिए तथा वेदकसम्यक्त्व रहित पिछले कूटों में छह प्रकृतिरूप स्थान के प्रमत्त-अप्रमत्तगुणस्थान सम्बन्धी एक-एक कूट मिलकर दो कूट हुए सो ये कूट अपूर्वकरण गुणस्थान के ६ प्रकृति रूप कूट के समान ही हैं अत: यहाँ भी दो कूटों को पुनरुक्त होने से ग्रहण नहीं किया, इस प्रकार चार कूट सम्बन्धी चार पुनरुक्त स्थानों को छोड़ देने से ६ प्रकृति रूप ७ ही स्थान यहाँ कहे हैं। उसी प्रकार पूर्व में ५ प्रकृतिरूप ९ स्थान कहे थे, किन्तु यहाँ पर ४ ही स्थान कहे हैं, क्योंकि पूर्वोक्त ९ स्थानों में वेदकसम्यक्त्वसहित पहले कूटों में प्रपत्त-अप्रमत्त गुणस्थान सम्बन्धी एक-एक कूट कहा था, किन्तु समान होने से यहाँ पर पुनरुक्त को छोड़कर एक ही ग्रहण किया तथा वेदकसम्यक्त्वरहित पिछले कूटों में देशसंयतगुणस्थान का एक, प्रमत्त व अप्रमत्तगुणस्थान सम्बन्धी दो-दो और अपूर्वकरणगुणस्थान सम्बन्धी दो इस प्रकार इन सात कूटों में प्रमत्त-अप्रमत्तगुणस्थान सम्बन्धी दो-दो कूट अपूर्वकरण गुणस्थान के दो कूटों के समान हैं अतः चार कूटों के ४ स्थान कम कर दिए एवं वेदकसम्यक्त्व सहित कूटों में एक पुनरुक्तकूट को छोड़ दिया ऐसे ५ कूटों के ५ स्थान कम कर देने से ५ प्रकृति के चार ही स्थान शेष रहे। तथैव पूर्व में ४ प्रकृति रूप ३ स्थान कहे थे, किन्तु
१. "एक्का छक्केक्कारस दस सत्त चउक एक्कां चेव । दोसु च बारस भङ्गा एक्कन्हि य होति चत्तारि ॥" जयधवल पु. १०५. ५राध.पु. १५, पृ.८२ भी देखो।