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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४४१ दर्शनावरणकर्म के बन्धस्थानों का कथन करके आगे उदयस्थानों का कथन करते खीणोत्ति चारि उदया, पंचसु णिद्दासु दोसु णिहासु। एके उदगं गन्ने खीणदतरिमोति चुदया।।४६१॥ अर्थ- दर्शनावरणकर्म की चक्षुदर्शनावरणादि चार प्रकृतियों का उदयस्थान जागृतावस्था वाले जीव के मिथ्यात्व से क्षीणकषायगुणस्थान पर्यंत है और निद्रावान् जीव के क्षीणकषायगुणस्थान के द्विचरमसमयपर्यंत पाँच प्रकृति रूप उदयस्थान जानना।। विशेष- प्रमत्तगुणस्थानपर्यंत ५ निद्राओं में से किसी एक निद्रा का तथा उसके आगे निद्राप्रचला में से किसी एक का उदय होता है। उदयस्थानों का कथन करके अब दर्शनावरणकर्म के सत्त्वस्थानों का कथन करते हैं मिच्छादुवसंतोत्ति य, अणियट्टीखवगपढमभागोत्ति। णवसत्ता खीणस्स दुचरिमोत्ति य छच्चदूवरिमे ।।४६२ ।। अर्थ-- मिथ्यात्व से उपशान्तकषायगुणस्थान पर्यंत और क्षपकश्रेणी में अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के प्रथमभाग पर्यन्त दर्शनावरणकर्म का ९ प्रकृति रूप सत्त्वस्थान है। इसके आगे क्षीणकषायगुणस्थान के द्विचरमसमयपर्यंत ६ प्रकृतिरूप ही सत्त्वस्थान है, क्योंकि स्त्यानगृद्धि आदि तीन प्रकृति अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के प्रथमभाग में ही नष्ट होती हैं। क्षीणकषायगुणस्थान के द्विचरमसमयपर्यंत दर्शनावरणकर्म का ६ प्रकृति रूप तथा चरमसमय में ४ प्रकृति रूप सत्त्वस्थान है। अथानन्तर मोहनीय कर्म के बन्धस्थानों को कहते हैं बावीसमेक्कवीसं, सत्तारस तेरसेव णव पंच। चदुतियदुगं च एकं, बंधट्ठाणाणि मोहस्स॥४६३॥ अर्थ- मोहनीय कर्म के २२-२१-१७-१३-९-५-४-३-२ और १ प्रकृति रूप १० बन्धस्थान जानने चाहिए। धवल पु. १५ पृ.८१। २. "बावीसमेकवीसं सत्तारस तेरसेव णव पंच | च तिय दुग च एक बंधट्ठाण्याणि मोहस्स।" (पंचसंग्रह ज्ञानपीठ पृ. १८८ गा. २४६)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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