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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४३८
उपशान्तकषायगुणस्थान से नीचे उतरते हुए सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान को छोड़कर अनिवृत्तिकरणादि गुणस्थानों को प्राप्त नहीं होते इसलिए एक प्रकृति के बन्ध होने के बाद सात और आठप्रकृति के बन्ध रूप दो भुजाकारबन्ध नहीं होते तथा अप्रमत्त व अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के बीच के गुणस्थान छोड़कर उपशान्तकषायगुणस्थान को प्राप्त नहीं होते इसलिए आठ और सात प्रकृति के बन्ध के पश्चात् एक प्रकृति के बन्धरूप दो अल्पतरबन्ध भी नहीं करते हैं।
शंका- उपशान्तकषायगुणस्थान में मरणकर देव असंयत होता है तो वहाँ एक प्रकृति के बन्ध के पश्चात् सात प्रकृति का बध एवं एक प्रकृतिक बन्ध के बाद आठ प्रकृति के बन्धरूप जो दो भुजकारबन्ध है वे क्यों नहीं कहे?
समाधान-नहीं कहे, क्योंकि अबद्धायुष्क का मरण नहीं होता अत: एकप्रकृतिकबन्ध के बाद सात प्रकृति के बन्धरूप भुजकार का अभाव है और यदि बद्धायुष्क मरण कर असंयतगुणस्थानवर्ती देव हो वहाँ एक प्रकृतिक बन्ध के पश्चात् ७ प्रकृति का बंधरूप भुजकारबन्ध तो सम्भव है, किन्तु एक प्रकृतिकबन्ध के बाद आठ प्रकृति के बन्धरूप भुजकारवन्ध का अभाव है क्योंकि देव के अपनी आयु के छह माह अवशेष रहने पर ही परभव सम्बन्धी आयु का बन्ध होता है इसी कारण वे दोनों भुजकारबन्ध नहीं कहे। पहले किसी भी प्रकृति का बन्ध नहीं होता था किन्तु बाद में बन्ध करे सो यह अवक्तव्यबन्ध है। अवक्तव्यबन्ध मूल प्रकृतियों के बन्ध में सम्भव नहीं है, क्योंकि सर्वमूलप्रकृतियों के बन्ध का अभाव नहीं है। इस प्रकार बन्धस्थान का कथन करके अब उदयस्थान कहते हैं
अट्ठदओ सुहुमोत्ति य, मोहेण विणा हु संतखीणेसु।
घादिदराण चउक्कस्सुदओ केवलिदुगे णियमा ॥४५४ ॥ अर्थ- सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान पर्यन्त आठ मूल प्रकृतियों का उदय है। उपशांतकषायक्षीणकषायगुणस्थान में मोहनीयकर्म के बिना सात मूलप्रकृतियों का उदय है तथा सयोगकेवलीअयोगकेवलीगुणस्थान में चार अघातियाकर्मों का उदय नियम से जानना; क्योंकि चार घातिया कर्मों का क्षय हो जाता है।
घादीणं छदुमट्ठा उदीरगा रागिणो हि मोहस्स ।
तदियाऊण पमत्ता जोगंता होंति दोण्हंपि॥४५५ ॥ अर्थ- तीन घातिया कर्मों की उदीरणा क्षीणकषायगुणस्थान पर्यंत छद्मस्थज्ञानी करते हैं। मोहनीयकर्म की उदीरणा करने वाले सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती सरागीजीव हैं, वेदनीय और आयुकर्म