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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ४३७ अर्थ- मिश्रगुणस्थान के बिना अप्रमत्तपर्यन्त ६ गुणस्थानों में जीव आयु बिना ७ प्रकार के अथवा आयु सहित ८ प्रकार के कर्म को बाँधता है। मिश्र, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में आयु बिना सात प्रकार के ही कर्म बँधते हैं। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में आयु व मोह के बिना ६ प्रकार के कर्म का ही बन्ध होता है, उपशान्तकषायादि तीन (उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली) गुणस्थानों में एक वेदनीय कर्म का ही बन्ध होता है और अयोगीगुणस्थान बन्ध रहित है। "चत्तारि तिणि सिय, जयडिट्ठाणाणि मूलपयडीणं । अवट्टिदाणिवि कमे होंति ॥४५३ ॥ भुजगारप्पदराणि य, अर्थ- मूल प्रकृतिबन्धस्थान, भुजगारबन्धस्थान, अल्पतरबन्धस्थान और अवस्थितबन्धस्थान क्रम से चार, तीन तीन और चार हैं ॥४५३ ॥ विशेषार्थ - इस प्रकार मूल प्रकृतियों के सामान्य से आठ, सात, छह और एक प्रकृति रूप चार बन्धस्थान हैं। यहाँ उपशमश्रेणी से उतरते हुए भुजकारबन्ध तीन प्रकार हैं। उपशान्तकषायगुणस्थान में एक प्रकृति का बन्ध था वहाँ से सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में आया तब ६ प्रकृति का बन्ध किया अत: एक भुजकारबन्ध तो यह हुआ तथा सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में ६ प्रकृति का बन्ध था वहाँ से अनिवृत्तिकरणगुणस्थान को प्राप्त हुआ और वहाँ सात प्रकृति का बन्ध होने से यह भी भुजकारबन्ध हुआ । अपूर्वकरणगुणस्थान में सातप्रकृति का बन्ध था, नीचे प्रमत्तादि गुणस्थानों में आठ प्रकृति का बन्ध होगा, यह भी एक भुजकार बन्ध है। इस प्रकार ये तीन भुजकार बन्ध होते हैं। तथैव अल्पतरबन्ध तीन होते हैं— आठकर्म के बन्ध के पश्चात् सातकर्मों का बन्ध होना एक अल्पतरबन्ध है, सात प्रकृति के बन्ध के बाद ६ प्रकृति का बन्ध होना दूसरा अल्पतरबन्ध है, तथा ६ प्रकृति के अनन्तर एक प्रकृति का बन्ध हुआ सो एक यह भी अल्पतर बन्ध है । इस प्रकार अल्पतरबन्ध के ये तीन भेद जानना । स्वस्थान में पहले जितने कर्मों का बन्ध हो उतने ही कर्म अनन्तरसमय में भी बँधे वह अवस्थित बन्ध कहलाता है। इसके भी चार भेद हैं— पूर्व में आठकर्मों का बन्ध करता था पश्चात् भी आठकर्मों का ही बन्ध होना प्रथम अवस्थितबन्ध है, पहले सातकर्मों का बन्ध करता था पश्चात् भी सातकर्मों का बन्ध करने लगा यह अवस्थित बन्ध का दूसरा प्रकार है। पूर्व में ६ कर्मों का बन्ध करता था अनन्तर भी ६ ही कर्मों का बन्ध करना तीसरा अवस्थितबन्ध है तथा पहले एक कर्म का बन्ध करता था पश्चात् भी एक ही कर्म का बन्ध करता है यह चतुर्थ अवस्थितबन्ध है। इस प्रकार अवस्थितबन्ध भी चार प्रकार का जानना ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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