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________________ गोम्मटसार कार्यवाह-४३८: .:: . .. जहाँ विसंयोजना हो वहाँ पर्यन्त अपकर्षणकरण है तथा नरकायु का असंयतगुणस्थान पर्यन्त और तिर्यञ्चायु का देशसंयतगुणस्थान पर्यंत अपकर्षण, उदीरणाकरण, सत्त्वकरण और उदयकरण होते हैं।॥४४८॥ मिच्छस्स य मिच्छोत्ति य, उदीरणा उवसमाहिमुहियस्स । समयाहियावलित्ति य सुहुमे सुहुमस्स लोहस्स ॥४४९ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थान में उपशमसम्यक्त्व के सम्मुख होने वाले जीव के एक समय अधिक आवलीप्रमाण काल शेष रहने तक मिथ्यात्त्वप्रकृति का उदीरणाकरण होता है। सूक्ष्मलोभ का सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में ही एक समय अधिक आवलीकाल शेष रहने तक उदीरणाकरण है, क्योंकि उदयावली शेष रह जाने पर उदीरणा संभव नहीं है। उदये संकममुदये, चउसुवि दादं कमेण णो सक्कं ।' उवसंतं च णिधत्तिं, णिकाचिदं तं अपुव्वोत्ति ।।४५० ॥ अर्थ- जो उदयावली को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होता है ऐसा उपशांतकरणद्रव्य तथा जो संक्रमण अथवा उदय को प्राप्त होने में समर्थ नहीं है ऐसा निधत्तिकरणद्रव्य एवं जो उदयावली, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण को प्राप्त होने में समर्थ नहीं है ऐसा निकाचितकरणद्रव्य है। ये तीनों ही प्रकार के करणद्रव्य अपूर्वकरणगुणस्थान पर्यन्त ही पाए जाते हैं, क्योंकि अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में प्रवेश करने के प्रथम समय में ही सभी कर्मों के ये तीनों करण युगपत् व्युच्छिन्न हो जाते हैं। इन तीनों करणों का स्वरूप सविस्तार गा. ४४० के विशेषार्थ में दिया जा चुका है। इति दशकरणचूलिकाधिकार सम्पूर्ण । इस प्रकार आचार्यश्री. नेमिचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती विरचित गोम्मटसारकर्मकाण्ड की सिद्धांतज्ञानदीपिका नामा हिन्दी टीका में 'त्रिकरणचूलिका' नामक चतुर्थाधिकार पूर्ण हुआ | १.उदा सक्रमउदए चदुसु वि दादं कमेण णो सबै । उसंत चणिधत्तं णिकाचिदं चाविज कम्मं ।। (धवल पु.६ पृ. २९५, धवल पु. ९१. २३६ और ध, पु. १५ पृ. २५६, गो. क. गाथा ४४०) २. 'सच्चेसि क्रम्माणमणियट्टिाणाणपसपढमसमए नेत्र एदाणि तिणि त्रि करणाणि अक्कमेण बोंच्छिण्णाणि त्ति भणिदं होइ।' जयधवल पु. १३ पृ. २३११
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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