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___ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४३४
समाधान- जो प्रकृति अन्य प्रकृति रूप उदय होकर नाश को प्राप्त होती है उन परमुखोदयी प्रकृतियों के तो अन्तकाण्डक की अन्तिमफालि क्षयदेश है तथा जो स्वमुखोदय रूप से उदय होकर निकलती हैं उन स्वमुखोदयी प्रकृति के एक-एक समय अधिक एक-एक आवलीप्रमाण काल शेष रहने पर क्षयदेश है इसलिए इन १७ प्रकृतियों का एक आवती काल शेष रहने पर अपकर्षण होता है।
उवसंतोत्ति सुराऊ , मिच्छत्तिय खवगसोलसाणं च ।
खयदेसोत्ति य खवगे, अट्ठकसायादिवीसाणं ॥४४६ ।। अर्थ- उपशान्तकषायगुणस्थान पर्यंत देवायु के प्रदेश अपकर्षण (अवलम्बना) करण है। मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व एवं सम्यक्त्वप्रकृति ये ३ और अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में क्षय होने वाली
सोलहप्रकृतियों के अन्तकाण्डक की अन्तिमफाली पर्यंत अपकर्षणकरण है ऐसा जानना। अनिवृत्तिकरण में ही शेष बीस प्रकृतियों के अपने-अपने क्षयदेशपर्यन्त अपकर्षणकरण है।
मिच्छतियसोलसाणं, उवसमसेढिम्मि संतमोहोत्ति।
अट्ठकसायादीणं, उवसमियट्ठाणगोत्ति हवे ॥४४७॥ अर्थ- उपशमश्रेणी में मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति एवं नरकाद्विकादिक १६ प्रकृतियों का उपशांतकषाय पर्यंत अपकर्षणकरण है तथा आठ कषायादिक का अपने-अपने उपशम के स्थान पर्यंत अपकर्षणकरण है॥४४७ ।।
पढमकसायाणं च विसंजोजकं वोत्ति अयददेसोत्ति ।
णिरयतिरियाउगाणमुदीरणसत्तोदया सिद्धा॥४४८॥ अर्थ- अनन्तानुबन्धीचतुष्क की असंयत, देशसंयत, प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थान में यथासम्भव
१. शंका-- अवलम्बनाकरण किसे कहते हैं? समाधान- परभवसम्बन्धी आयु की उपरिम स्थिति में स्थित द्रव्य का अपकर्षण द्वारा नीचे पतन करना अवलम्बनाकरण कहा जाता है। शंका- इसकी अपकर्षण संज्ञा क्यों नहीं की? समाधाननहीं, क्योंकि परभविक आयु का उदय नहीं होने से इसका उदयावलि के बाहर पतन नहीं होता इसलिए इसकी अपकर्षण संज्ञा करने में विरोध आता है। (आशय यह है कि परभव सम्बन्धी आयु का अपकर्षण होने पर भी उसका पतन आनाधाकाल के भीतर न होकर आबाधा से ऊपर स्थित स्थिति निषकों में ही होता है इसी से इसे अपकर्षण से जुदा बतलाया गया है।) (ध. पु. १० पृ. ३३३-३३१)
२. नरकदिक, तिर्यञ्चद्विक, एकेन्द्रियादि४ जाति, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण, आतप, उद्योत. स्त्यानगृद्धिआदि तीननिद्रा ये १६ प्रकृति।
३. अप्रत्याख्यानकषाय ४, प्रत्याख्यानकषाय ४,९ नोकषाय, सञ्चलनक्रोध-मान-माया ।