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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४३३
के बिना सयोगकेवली गुणस्थान पर्यन्त ६ करण होते हैं, उसके आगे अयोगीगुणस्थान में सत्त्व और उदयरूप दो ही करण होते हैं। अब उपशान्तकषाय गुणस्थान में और भी जो विशेषता है उसको कहते हैं
णवरि विसेसं जाणे, संकममवि होदि संतमोहम्मि। ... मिच्छस्स य मिस्सस्स य सेसाणं णत्थि संकमणं ॥४४३ ।।
अर्थ-उपशान्तकषायगुणस्थान में विशेषता यह है कि मिथ्यात्व और मिश्रप्रकृति में संक्रमणकरण भी पाया जाता है अर्थात् इनके परमाणुओं को सम्यक्त्व प्रकृति रूप परिणमन करता है शेष प्रकृतियों के छह ही करण होते हैं।
विशेषार्थ- यथा अपूर्वकरणगुणस्थान में तो उपशम, निधत्ति और निकाचित इन तीन करणों की व्युच्छित्ति होने पर अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में व्युच्छित्ति नहीं है तथा उपशान्तकषायगुणस्थान में मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति के ७ करण हैं, अन्य प्रकृतियों में संक्रमण, उपशान्त, निधत्ति और निकाचितकरण बिना ६ करण हैं। क्षीणकषायगुणस्थान में व्युच्छित्ति नहीं है, सयोगीगुणस्थान में बन्ध, उत्कर्षण, अपंकर्षण और उदारणा इभ चार कारणों की ज्युच्छित्ति होती है। अयोगीगुणस्थान में सत्त्वउदय इन दो करणों की व्युच्छित्ति होती है, शेष कथन सुगम है।
बंधुक्कट्टणकरणं, सगसगबंधोत्ति होदि णियमेण ।
संकमणं करणं पुण, सगसगजादीण बंधोत्ति ॥४४४ ॥ अर्थ- जिस-जिस प्रकृति का जब बन्ध होता है तभी बन्ध और उत्कर्षण करण होते हैं और अपनी-अपनी स्वजातीय प्रकृतियों के बन्ध समय में संक्रमणकरण होता है।
ओक्कट्टणकरणं पुण, अजोगिसत्ताण जोगिचरिमोत्ति।
खीणं सुहुमंताणं, खयदेसं सावलीयसमयोत्ति ।।४४५ ।। अर्थ-अयोगीगुणस्थान में सत्त्वरूप जो ८५ प्रकृतियाँ हैं उनका अपकर्षणकरण सयोगीगुणस्थान के अन्तसमय पर्यंत जालना। क्षीणकषायगुणस्थान में सत्त्व से व्युच्छिन्न होने वाली १६ प्रकृतियाँ और सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में सत्त्व से व्युच्छिन्न होने वाली सूक्ष्मलोभ इस प्रकार इन १७ प्रकृतियों का अपकर्षणकरण एक आवती कम क्षयदेशपर्यंत जानना।
शंका-क्षयदेश किसे कहते हैं ?