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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४२७
बन्धं प्रति भवत्यैक्यमन्योन्यानुपवेशतः।'
युगपद् द्रावितस्वर्णरौप्यवज्जीवकर्मणोः ।। अर्थ- जिस प्रकार एक साथ पिघलाए हुए स्वर्ण और चांदी का एक पिण्ड बनाए जाने पर परस्पर प्रदेशों के मिलने से दोनों में एकरूपता मालूम होती है उसी प्रकार बन्ध की अपेक्षा जीव और कर्मों के प्रदेशों के परस्पर मिलने से दोनों में एम्मायालूम होरी है.:::.:...:
उत्कर्षण- "कम्मप्पदेसहिदिवट्ठावणमुक्कड्डणा' अर्थात् कर्मप्रदेशों की स्थिति को बढ़ाना उत्कर्षण है। "उक्कडणा णाम कम्मपदेसाणं पुग्विल्लविदीदो अहिणवबंधसंबंधेण ट्ठिदिवड्डावणं" अर्थात् नवीन बंध के संबंध से पूर्व की स्थिति में से कर्मपरमाणुओं की स्थिति बढ़ाना उत्कर्षण है।' "स्थित्यनुभागयोर्वृद्धिः उत्कर्षणं'' अर्थात् स्थिति व अनुभाग में वृद्धि का होना उत्कर्षण कहलाता
अपकर्षण- "(कम्म) पदेसाणं ठिीणमोवट्टणा ओकडणा णाम' अर्थात् कर्मप्रदेशों की स्थितियों के अपवर्तन का नाम अपकर्षण है। "स्थित्यनुभागयोर्हानिरपकर्षण णाम'' अर्थात् स्थिति व अनुभाग (कर्मों के) में हानि का होना अपकर्षण है।
संक्रमण- "बंधेण लद्धप्पसरूवस्स कम्मस्स मिच्छत्तादिभेयभिण्णस्स समयाविरोहण सहावंतरसंकंतिलक्खणो संकमो पयडिसंकमादिभेयभिण्णो' अर्थात् बन्ध के द्वारा जिन्होंने कर्मभाव को प्राप्त किया है और जो मिथ्यात्वादि अनेक भेदरूप हैं ऐसे कमों का यथाविधि स्वभावान्तर संक्रमणरूप संक्रम का लक्षण है और वह संक्रमण प्रकृतिसक्रमणादि अनेक भेद रूप है। “अवत्थादो अवत्थंतरं संकंति संकमो त्ति' अर्थात् एक अवस्था से दूसरी अवस्था रूप संक्रांत होना संक्रम है। "जा पयडी अण्णपयडिं णिज्जदि एसो पयडिसंकमो" अर्थात् जो एक प्रकृति अन्यप्रकृतिस्वरूपता को प्राप्त कराई जाती है, यह प्रकृतिसंक्रम कहलाता है। "कम्मसंकमो चउब्विहो । तं जहा पयडिसंकमो डिदिसंकमो अणुभागसंकमो पदेससंकमो चेदि ।। मिच्छत्तादिकजजणणक्खमस्स पोग्गलक्खंधस्स कम्मववएसो। तस्स संकमो कम्मत्तापरिच्चाएण सहावंतर संकंती। सो पुण दवट्टियणयावलंबणे णेगत्तमावण्णो पज्जवट्ठियणयावलंबणे ण चउप्पयारो होइ पयडिसंकमादिभेएण। तत्थ पयडीए पयडिअंतरेसु संकमो पयडिसंकमो ति भण्णइ, जहा कोह पयडीए माणादिसु संकमो त्ति । अर्थात् कर्मसंक्रमण चार प्रकार का है। यथा-प्रकृतिसंक्रम, स्थितिसंक्रम, अनुभागसंक्रम और प्रदेशसंक्रम। जो पुद्गलस्कंध मिथ्यात्वादि कार्य को उत्पन्न करने में समर्थ है वह १. तत्त्वार्थसार अ. ५ श्नो. १८। २. ५. पु. १० पृ. ५२। ३. जयधवल पु. ८ पृ. २५३ । ४. गो,क, गाथा ४३८ की टीका। ५. ध.पु. १० पृ. ५३। ६. गो. क. टीका (गाथा ४३८ की) ७. जयध. पु.८ पृ. २।
.. जयध. पु. ९ पृ.३। ९. धवल पु. १६५. ३४०।