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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४१० ... ... आगे प्रकृतियों के नाम का नियम कहते हैं उगुदालतीससत्तयवीसे एक्केकबारतिचउक्के । इगिचदुदुगतिगतिगचदुपणदुगतिण्णि संकमणा ॥४१८॥ अर्थ- उनतालीस प्रकृतियों में एक, ३० प्रकृतियों में चार, सात प्रकृतियों में दो, बीस प्रकृतियों में तीन, एक प्रकृति में तीन, एक प्रकृति में चार, बारह प्रकृतियों में पाँच, चार प्रकृतियों में दो, और चार प्रकृतियों में तीन प्रकार के संक्रमण होते हैं। इस गाथा में कही गई प्रकृतियों और भागहारों की यह संदृष्टि है-२ प्रकृति । ३९ | ३० | ७ | २० | १ | १ | १२ | ४ | ४ | ४ | | भागहार । १ ४ | २ | ३ | ३ | ४ | ५ २ | ३ | ३ | किस-किस प्रकृति में कौन-कौनसे संक्रमण होते हैं इसका कधन १० गाथाओं में करते हैं सुहुमस्स बंधघादी, सादं संजलणलोहपंचिंदी। तेजदुसमवण्णचऊ , अगुरुगपरघादउस्सासं॥४१९ ।। सत्थगदी तसदसयं, णिमिणुगुदाले अधापवत्तो दु। थीणतिबारकसाया, संढित्थी अरदि सोगो य॥४२० ॥ तिरियेयारं तीसे, उव्वेलणहीणचारि संकमणा। णिद्दा पयला असुहं, वण्णचउक्वं च उवघादे॥४२१ ।। सत्तण्हं गुणसंकममधापवत्तो य दुक्खमसुहगदी। संहदिसंठाणदसं, णीचापुण्णथिरछक्कं च ॥४२२ ।। वीसण्हं विज्झाद, अधापवत्तो गुणो य मिच्छत्ते। विज्झादगुणे सव्वं, सम्मे विज्झादपरिहीणा ॥४२३॥विसेसयं॥ १, उगुदाल तीस सत्त य वीस एगेग वार तियच्चउक्कं । एवं चदु दुग तिय तिय चद् पण दुग तिग दुगं च बोद्धव्यं । २. धवल पु. १६ पृ. ४१०।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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