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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४०९ है और असंयत से अप्रमत्तगुणस्थान पर्यंत मिथ्यात्व का विध्यातसंक्रमण होता है अपूर्वकरण से उपशांतकषाय गुणस्थान पर्यन्त बन्धरहित अप्रशस्तप्रकृतियों का गुणसंक्रमण है। अत: अन्यत्र भी प्रथमोपशमसम्यक्त्वादि के ग्रहण के प्रथम समय से अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त गुणसंक्रमण है ऐसा जानना । सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति के पूरणकाल में मिथ्यात्व के क्षय करने में अपूर्वकरण परिणामों से मिथ्यात्व के अंतिमकाण्डक की द्विचरमफालिपर्यन्त गुणसंक्रमण और चरमफालि में सर्वसंक्रमण होता विशेषार्थ- ''बंधे अधापवत्तो' का स्पष्टीकरण करते हुए बतलाते हैं कि जहाँ जिन प्रकृतियों का बन्ध सम्भव है वहाँ उन प्रकृतियों का बन्ध होने पर और उसके न होने पर भी अध:प्रवृत्तसंक्रम होता है। यह नियम बन्धप्रकृतियों के लिए है, अबन्धप्रकृतियों के लिए नहीं; क्योंकि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियों में भी अधःप्रवृत्तसंक्रम पाया जाता है। 'विज्झाद अबधे' का अर्थ करते हुए कहते हैं कि जिन प्रकृतियों का जहाँ नियम से बन्ध सम्भव नहीं है वहाँ उन प्रकृतियों का विध्यातसक्रम होता है। यह भी नियम मिथ्यात्व से अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त ही धृव स्वरूप से है। 'गुणसंकमो दु एत्तो' अर्थात् अप्रमत्तगुणस्थान से आगे के गुणस्थानों में बन्धरहित प्रकृतियों का गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम भी होता है। शंका- सर्वसंक्रम भी होता है यह कहाँ से जाना जाता है ? समाधान- यह उपर्युक्त गाथा में प्रयुक्त 'तु' शब्द से जाना जाता है। यह प्ररूपणा अप्पसत्थाणं' अर्थात् अप्रशस्तप्रकृतियों की की गयी है, न कि प्रशस्तप्रकृतियों की; क्योंकि उपशमश्रेणि और क्षपकश्रेणि में भी बन्धरहित प्रशस्तप्रकृतियों का अधःप्रवृत्तसंक्रम देखा जाता है। अथानन्तर सर्वसंक्रमणरूप प्रकृतियों को कहते हैं तिरियेयारुब्वेल्लणपयडी संजलणलोहसम्ममिस्सूणा । मोहा थीणतिगं च य, बावण्णे सव्वसंकमणं ॥४१७ ॥ अर्थ- पूर्वोक्त तिर्यगेकादशप्रकृतियाँ, उद्वेलनरूप प्रकृतियाँ, (सज्वलनलोभ, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व इन तीन बिना) मोहनीय कर्म की २५ और स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा इन सर्व ५२ प्रकृतियों में सर्वसंक्रमण होता है। १. धवल पु. १६, पृ. ४०९-४१० ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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