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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४०८ • उब्वेलणपयडीणं गुणं तु चरिमम्हि कंडये णियमा। चरिमे फालिम्मि पुणो सव्वं च य होदि संकमणं ।।४१३।। अर्थ- उद्वेलन प्रकृतियों का द्विचरमकाण्डकपर्यंत उद्वेलन संक्रमण तथा अन्तिमकाण्डक में नियम से गुणसंक्रमण होता है और अन्तिम फालि में सर्वसंक्रमण होता है। सम्यक्त्व व सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति उद्वेलनप्रकृति में समाविष्ट है इसलिए इन प्रकृत्तियों का भी चरमकाण्ङक में गुणसंक्रमण व चरमफालि में सर्वसंक्रमण होता है। (गाथा ६१२ से ६१७ तक देखो।) आगे सर्वसंक्रमण प्रकृतियों में तिर्यगेकादश अर्थात् जिनका उदय तिर्यञ्चगति में ही होता है ऐसी जो ११ प्रकृतियाँ हैं उनके नाम गिनाते हैं तिरियदुजादिचउक्नं, आदावुज्जोवथावरं सुहुमं। . साहारणं च एदे, तिरियेयारं मुणेदव्वा ।।४१४॥ अर्थ- तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय आदि चार जाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण नाम कर्म की इन ११ प्रकृति का उदय तिर्यञ्चगति में ही होता है इसलिए इनको तिर्यगेकादश कहते हैं। अब उद्वेलन प्रकृतियों को कहते हैं आहारदुगं सम्म, मिस्सं देवदुगणारयचउक्वं। उच्चं मणुदुगमेदे, तेरस उब्वेलणा पयडी ॥४१५ ॥ अर्थ- आहारकशरीर-आहारकअनोपाङ्ग, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, देवगतिदेवगत्यानुपूर्वी, नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी. वैक्रियिकशारीर-वैक्रियिकअंगोपांग, उच्चगोत्र और मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी ये १३ उद्वेलनप्रकृतियाँ हैं। बंधे अधापवत्तो, विज्झादं अबंध सत्तमोत्ति हु अबंधे। एत्तो गुणो अबन्धे, पयडीणं अप्पसत्थाणं ।।४१६॥' अर्थ- प्रकृतियों का बन्ध होने पर अधःप्रवृत्तसंक्रमण होता है, किन्तु मिथ्यात्वप्रकृति का नहीं होता है, क्योंकि "सम्म मिच्छं मिस्स" इत्यादि गाथा ४११ के द्वारा इसका निषेध पहले ही कर दिया १. बन्धे अधारमत्तो बिज्झाद अबन्ध अप्पमत्तंतो । गुणसंकमो दु एत्तो पयडीणं अप्पसत्थाणं । धवल पु. १६ पृ. ४०९ ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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