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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ४११ अर्थ- पाँचज्ञानावरण, चारदर्शनावरण, पाँच अन्तराय, सातावेदनीय, सञ्ज्वलनलोभ, पंचेन्द्रियजाति, तैजस - कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वर्णादिचार, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और पाँच अन्तराय इन ३९ प्रकृतियों में उद्वेलनसंक्रमण नहीं होता तथा 'विज्झादसत्तमोत्ति हु अबंधे' इस सूत्रानुसार अप्रमत्तगुणस्थान से पूर्व इनकी बन्धव्युच्छित्ति नहीं होने से विध्यातसंक्रमण भी इनमें नहीं है। 'एत्तो गुणे अबंधे' इस सूत्र के अनुसार इनमें गुणसंक्रमण भी नहीं है। सर्वसंक्रमण रूप जो ५२ प्रकृतियाँ कही हैं उनमें ये प्रकृतियां नहीं हैं अतः सर्वसंक्रमण भी इनमें नहीं होता। इस प्रकार उपर्युक्त ३१ प्रकृतियों में एक अधःप्रवृत्त संक्रमण ही होता है, शेष चार संक्रमण नहीं होते । अन्य प्रकृतियों में भी इसी प्रकार संक्रमण का कथन आगे करेंगे सो वहाँ से समझना । शंका- मिथ्यात्वप्रकृति का मिध्यात्वगुणस्थान में अधःप्रवृत्तसंक्रमण क्यों नहीं कहा ?. समाधान- “सम्मं मिच्छं मिस्सं सगुणद्वाणम्मि पोष संकमदि" इत्यादि गाथा ४११ के अनुसार मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्वप्रकृति का अधःप्रवृत्तसंक्रमण नहीं कहा है। स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा, बारहकषाय, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, अरति, शोक और तिर्यगेकादश की इन ३० प्रकृतियों में उद्वेलन संक्रमण के बिना चार संक्रमण पाए जाते हैं। निद्रा, प्रचला, अशुभवर्णादि चार और उपघात इन ७ प्रकृतियों में गुणसंक्रमण और अधः प्रवृत्तसंक्रमण ही पाए जाते हैं। असातावेदनीय, अप्रशस्तविहायोगति, वज्रर्षभनाराचसंहनन बिना ५ संहनन समचतुरस्रसंस्थान बिना ५ संस्थान, नीचगोत्र, अपर्याप्त, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और अयशस्कीर्ति इस प्रकार २० प्रकृतियों में विध्यात, अधःप्रवृत्त और गुणसंक्रमण पाए जाते हैं। मिथ्यात्वप्रकृति में विध्यात, गुण और सर्वसंक्रमण पाये जाते हैं तथा सम्यक्त्वप्रकृति में विध्यातसंक्रमण के बिना चार संक्रमण पाए जाते हैं ॥ ४१९-२३ ॥ विशेषार्थ- पाँचज्ञानावरण, चारदर्शनावरण, सातावेदनीय, सज्ज्वलनलोभ, पञ्चेन्द्रियजाति तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्तवर्ण-रस-गंध-स्पर्श, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और पाँच अन्तराय; इन ३९ प्रकृतियों का एक अधः प्रवृत्तसंक्रम ही होता है, क्योंकि पाँचज्ञानावरण, चारदर्शनावरण और पाँच अन्तराय का मिध्यादृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान के अन्तिम समय तक बन्ध ही है । इसीलिए इन प्रकृतियों के अधः प्रवृत्त संक्रमण को छोड़कर अन्य संक्रम नहीं होते, बन्धव्युच्छित्ति के हो जाने पर उनका संक्रमण नहीं होता, क्योंकि प्रतिग्रह (जिनमें विवक्षित प्रकृतियां संक्रान्त होती हैं ।) प्रकृतियों का यहाँ अभाव है। शंका- सातावेदनीय, पञ्चेन्द्रिय जाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्त्र संस्थान, H
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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