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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४०६ गाथोक्त भागाहार (संक्रम) के जो उद्वेलनादि ५ भेद हैं उनके लक्षण कहते हैं—'करणपरिणामों के बिना रस्सी को उकलने के समान कर्मप्रदेशों का परप्रकृतिरूप से संक्रांत होना उद्वेलनासंक्रम है, इसका भागहार अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। यथा सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्व में आकर अन्तर्मुहूर्तपर्यंत सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व का अधःप्रवृत्तसंक्रम करता है उसके बाद उद्वेलनासंक्रम को प्रारम्भकर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व का स्थितिघात करने वाले उसके पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण उद्वेलना काल के अन्त तक निरंतर उद्वेलना भागहार के द्वारा विशेषहीन प्रदेश संक्रम होता है। यहां पर भज्यमान द्रव्य प्रत्येक समय में विशेषहान होता जाता है इसे विशेष हानि का कारण कहना चाहिए, किन्तु इतनी विशेषता है कि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व के अंतिम स्थितिकाण्डक में गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम हो जाता है। इस प्रकार उद्वेलना संक्रम का कथन किया। अब विध्यातसंक्रम का कथन करते हैं—वेदकसम्यक्त्व काल के भीतर दर्शनमोहनीय की क्षपणासम्बन्धी अध:प्रवृत्तकरण के अंतिम समय तक सर्वत्र ही मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व का विध्यातसंक्रम होता है तथा उपशमसम्यग्दृष्टि के भी गुणसंक्रमकाल के पश्चात् सर्वत्र विध्यातसंक्रम होता है। इसका भागहार भी अङ्गल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। इतनी विशेषता है कि उद्वेलनाभागहार से यह असंख्यात गुणाहीन है। इसी प्रकार अन्य प्रकृतियों के भी विध्यातसंक्रम का विषय यथासम्भव जानना चाहिए। अब अधःप्रवृत्तसंक्रम का लक्षण कहते हैं-बन्धप्रकृतियों का अपने बंध के सम्भव विषय में जो प्रदेश संक्रम होता है उसे अधःप्रवृत्तसंक्रम कहते हैं। उसका प्रतिभाग पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। चारित्रमोहनीय की २५ प्रकृतियों का अपने बंध के योग्य विषय में बध्यमान प्रकृतिप्रतिग्रह रूप से अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। गुणसंक्रम का लक्षण कहते हैं—प्रत्येक समय में असंख्यातगुणित श्रेणि रूप से जो प्रदेश संक्रम होता है उसे गुणसंक्रम कहते हैं। अपूर्वकरण के प्रथम समय से लेकर दर्शनमोहनीय की क्षपणा में, चारित्रमोहनीय की क्षपणा में, उपशमश्रेणि में, अनन्तानुबंधी की विसंयोजना में, सम्यक्त्व की उत्पत्ति में तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व की उद्वेलना के अंतिमकाण्डक में गुणसंक्रम होता है। इसका भागहार भी पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण होकर भी अधःप्रवृत्तसंक्रम के भागहार से असंख्यातगुणा हीन है। सर्वसंक्रम का स्वरूप कहते हैं—सभी प्रदेशों का जो संक्रम होता है उसे सर्वसंक्रम कहते हैं। वह कहां पर होता है? उद्वेलना, विसंयोजना और क्षपणा में अंतिम स्थिति काण्डक की अंतिम फालि के संक्रम के समय होता है। उसका भागहार एक अङ्कप्रमाण है। बंधे संकामिजदि, णोबंधे णत्थि मूलपयडीणं । दंसणचरित्तमोहे, आउचउक्के ण संकमणं ॥४१०॥ १. जयधवल पु.९ पृ. १७०-१७१। २. जयध. पु. ९ पृ. १७१। ३. जयध. पु. ९ पृ. ५७२ ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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