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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४०५
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अश पञ्चभागाहारचूलिका *
जत्थ वरणेमिचंदो, महणेण विणा सुणिम्मलो जादो।
सो अभयणंदिणिम्मलसुओवही हरउ पावमलं ।।४०८ ॥ अर्थ- जिस मन्थन बिना ही उत्कृष्ट नेमिचन्द्र निर्मल हुए ऐसे अभयनंदि का निर्मल शास्त्रसमुद्र जीवों के पापमल को दूर करें।
भावार्थ-लोकोक्ति है कि “समुद्रमंथन करके चन्द्रमा प्रकट हुआ" इसी प्रकार अभयनंदिनामा आचार्य के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रसमुद्र में से मंथनबिना ही नेमिचन्द्राचार्यरूपी निर्मलचन्द्रमा प्रकट हुए अर्थात् उस शास्त्र के अत्यल्पाभ्यास से ही निर्मलता प्राप्त हुई, ऐसी निर्मलता का कारण जो शास्त्रसमुद्र है वह समस्त जीवों के पाश्मल को दूर करे। इस प्रकार यहाँ आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण किया गया
अब भागाहारचूलिका के पाँच भेद कहते हैं
उव्वेलणविज्झादो, अधापवत्तो गुणो य सव्वो य।'
संकमदि जेहिं कम्मं, परिणामवसेण जीवाणं ।।४०९॥ अर्थ- संसारी जीवों के अपने जिन परिणामों से शुभकर्म और अशुभकर्म संक्रमण करें अर्थात् अन्य प्रकृति रूप परिणमें उन परिणामों को संक्रमण कहते हैं। उस संक्रमण के उद्वेलन, विध्यात, अधः-प्रवृत्त, गुण और सर्व के भेद से पाँचभेद हैं।
विशेषार्थ- उद्वेलन प्रकृतियों के द्रव्य में उद्वेलन भागहार का भाग देने पर जो द्रव्य आवे उतना द्रव्य प्रत्येक उद्वेलनकाण्डक द्वारा परप्रकृतिरूप संक्रमण होता है।
१. ध. पु. ५६ पृ ४०८ । तथा उव्वेलण विज्झादो, अधापत्रत्त-गुणसकमो थेय | तह सल्वसंकमोत्ति व पंचविहो संकमो यो ॥ (जय ध. पु. ९ पृ. १७२)
२. संकमादो समयाविरोहेण एयपयडिडिटिपदेसा अण्मयडिसरूवेण परिणमणलगादो। अर्थात् जैसा आगम में बतलाया है तदनुसार एक प्रकृति के स्थितिगत कर्मपरमाणुओं का अन्य सजातीय प्रकृति रूप परिणामना संक्रमण है। (जयधवल पु. '७ पृ. २३८)