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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४०१ आगे के स्वर्गों में तथा सम्यग्दृष्टि देव व नारकियों में निरन्तरबंधी है। तिर्यञ्चद्विक और नीचगोत्र---- ७वें नरक में मिथ्यादृष्टि तथा सासादनी जीव के एवं तेजकायिक-वायुकायिक जीवों के निरन्तरबंधी तथा अन्य जीवों के सासादन गुणस्थानं पयत सान्तरबंधी ही औदारिकाद्वक देव-नारोंकयों व चतुरिन्द्रियपर्यन्त तिर्यञ्च जीवों के निरन्तरबंधी है, अन्य जीवों के दूसरे गुणस्थान तक सांतरबंधी है। प्रशस्तविहायोगति, बज्रर्षभनाराचसंहनन, समचतुरस्रसंस्थान- सुभग, सुस्वर, आदेथ और पुरुषवेद दूसरे गुणस्थान तक सांतरबंधी और उसके आगे निरन्तरबंधी है। परघात, उच्छ्वास, पंचेंद्रिय, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक- प्रथमगुणस्थान में सांतरबंधी और आगे निरन्तरबंधी है। स्थिर, शुभ, यशस्कीर्ति, सातावेदनीय, हास्य, रति- छठे गुणस्थान तक सांतरबंधी और आगे के गुणस्थानों में निरन्तरबंधी नवप्रश्नचूलिका के अन्तर्गत आगत प्रश्नों के उत्तरस्वरूप प्रकृतियों की सन्दृष्टि - प्रकृति स्वोदयपरोदय बन्धी सान्तर व निरन्तरबन्धी बंध किस उदय किस गुणस्थान गुणस्थान से किस से किस गुणस्थान | गुणस्थान तक | तक प्रकृति संख्या १-१२ ५-१२ | १-६ । १२-१४ १-१ ज्ञानावरण ५ स्वोदयबन्धी चक्षुदर्शनावरणादि ४ स्वोदयबन्धी निद्रा-प्रचला स्वपरोदयबन्धी निद्रानिद्रादि ३ स्वपरोदयबन्धी सातावेदनीय स्त्रपरोदयबन्धी असातावेदनीय स्वफ्रोदधबन्धी मिथ्यात्व स्वोदयबन्धी अनन्तानुबन्धी ४ | स्वपरोटयबन्धी अप्रत्याख्यानावरण ४| स्वपरोदयबन्धी प्रत्याख्यानावरण ४ स्वपरोदयबन्धी सज्वलनक्रोधादि ३ | स्वपरोदयबन्धी सज्वलनलोभ स्वपरोदयबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धो निरन्तरबन्धी सान्तर-निरन्तरबन्धी | १-१३ सान्तरजन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी निरन्तरबन्धी १८-२१ २२-२५ २६-२९ - ३३
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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