SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 42
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४ सिद्धाणंतिमभागं, अभवसिद्धादणंतगुणमेव । समयपबद्धं बंधदि, जोगवसादो दु विसरित्थं ॥४।। अर्थ – यह जीव सिद्ध जीवों के अनंतवेंभाग तथा अभव्य जीवराशि जो जघन्य युक्तानन्त प्रमाण है, उससे अनंतगुणी' वर्गणाओं वाले समयप्रबद्ध को प्रतिसमय बाँधता है, तथा योगों की विशेषता से हीनाधिक रूप कर्म परमाणुओं को बाँधता है। विशेषार्थ - जैसे अधिक शक्ति वाला चुम्बक अधिक लोहकों को ग्रहण करता है और हीन शक्तिवाला चुम्बक अल्प लोहकणों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी योगशक्ति की हीनाधिकता से अल्प या अधिक कर्म परमाणुओं को ग्रहण करता है। कर्म परमाणुओं के बन्थ का प्रमाण कहकर अब उनके उदय व सत्त्व का प्रमाण कहते जीरदि समयपबद्धं, पओगदो णेगसमयबद्धं वा । गुणहाणीण दिवड्डं, समयपबद्धं हवे सत्तं ॥५॥ अर्थ - प्रतिसमय एक समयप्रबद्ध की निर्जरा होती है, किन्तु प्रयोग से अनेक समयप्रबद्धों की । भी निर्जरा हो जाती है तथापि कुछ कम डेढ़गुणहानि गुणित समयप्रबद्ध प्रमाण द्रव्य सत्ता में रहता है। विशेषार्थ - प्रतिसमय नाना निषेकों के समूहरूप परमाणुओं का एक समय-प्रबद्ध फल देकर निर्जीर्ण हो जाता है। अर्थात् उदयरूप होकर निर्जरा को प्राप्त होता है, किन्तु तपस्यारूप विशिष्ट अतिशय से तथा आत्मा की सम्यक्त्वादि प्रवृत्ति के प्रयोगरूप हेतुओं से निर्जरा के ११ स्थान गुणस्थानाधिकार में कहे हैं; उनकी विवक्षा से एक समय में अनेक समयप्रबद्धों की भी निर्जरा हो जाती है, फिर भी डेढ़ गुणहानि से गुणित समय-प्रबद्ध सत्ता में रहता है। शंका - प्रति समय में एक समयप्रबद्ध का बन्ध कहा और एक समयप्रबद्ध की निर्जरा कही तो सत्त्व डेढ़ गुणहानि से गुणित समयप्रबद्ध प्रमाण कैसे कहा ? समाधान - इस शंका के समाधान के लिए इसी ग्रन्थ की गाथा ९४२-९४३-९४४ देखनी चाहिए। १. यहाँ परमाणुओं के अनन्तपने का नियत स्थल निश्चय करने के लिए दो प्रकार से कथन किया है । यथा-वे परमाणु सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण होकर भी अभव्यों की संख्या से अनन्तगुणे हैं। यानी यहाँ सिद्धों का ऐसा अनन्तवाँ भाग गृहीत है जो अभव्यों से अनन्तगुणत्व रखता है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy