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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३
बंधं पडि एयत्तं, लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं ।
तम्हा अमुत्ति भावो, णेयंतो होई जीवस्स ।। इति ॥ अर्थ – यद्यपि आत्मा बन्ध की अपेक्षा एक है, तथापि लक्षण की अपेक्षा वह भिन्न है अत: जीव का अमूर्तिक भाव अनेकान्तरूप है। बह एक अपेक्षा से तो है और एक अपेक्षा से नहीं है ।
अमृतचन्द्राचार्य ने भी कहा है -
"अमूर्त: स्वरूपेण जीव: पररूपावेशान्मूर्तोऽपि"२ जीव स्वरूप से अमूर्त है तथापि पर आवेश से मूर्तिक है। पुनश्च कहा है --
__ "अनादिबन्धनबद्धत्वतो मूर्तानां जीवावयवानां मूर्तेण शरीरेण सम्बन्धं प्रति विरोधासिद्धः"३ जीव के प्रदेश अनादिकालीन बन्धन से बद्ध होने के कारण मूर्त हैं। अतः मूर्त शरीर के साथ सम्बन्ध होने में कोई विरोध कोई नहीं आता।
___ "अणादिबंधणबद्धस्स जीवस्स संसारावत्थाए अमुत्तत्ताभावादो" अनादि- कालीन बन्धन से बद्ध रहने के कारण जीव का संसार अवस्था में अमूर्त होना संभव नहीं है। अब संसारी जीव कर्म-नोकर्म के साथ किस प्रकार का संबंध करता है यह कहते हैं
देहोदयेण सहिओ, जीवो आहरदि कम्म णोकम्मं ।
पडिसमयं सव्वंगं, तत्तायसपिंडओव्व जलं ॥३॥ अर्थ – यह जीव औदारिक आदि शरीर नामकर्म के उदय से योग सहित होकर प्रतिसमय कर्मनोकर्म वर्गणा को सर्वांग से ग्रहण करता है, जैसे तपाया हुआ लोहे का गोला सर्वांग से जल को ग्रहण करता है।
विशेषार्थ- देह से मतलब है औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्माण नामकर्म । इनमें से कार्माण नामकर्म के उदय से उत्पन्न योग से सहित जीव ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार के कर्म को ग्रहण करता है। शेष शरीर नामकर्म के उदय से सहित जीव उस नामवाले नोकर्म को ग्रहण करता
यह जीव प्रतिसमय कर्म-नोकर्मरूप होने वाले कितने पुद्गल परमाणुओं को ग्रहण करता है, यह कहते हैं - ५. सर्वार्थसिद्धि अ. २ सू. ७ की टीका तथा बृ.द.सं. गाथा ७ की टीका । २.पंचास्तिकाय गाथा ९७ की टीका तथा तत्वार्थसार ५/१६-१९ ३.घ.पु.१ पृ. २९२
४. ध.पु. १५ पृ. ३१