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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३६८
तीर्थङ्करप्रकृतिसहित हैं, किन्तु तिर्यञ्चके तीर्थङ्कर प्रकृत्तिके सत्त्वका अभाव है। अत: प्रथमपंक्तिका प्रथम स्थान, भुज्यमान-बध्यमान तिर्यञ्चायु और एक अन्य कोई आयु, इन दो बिना १४६ प्रकृतिरूप है। जहाँ भुज्यमान-मनुष्यायु, बध्यमान-नरकायु, भुज्यमान मनुष्यायु-बध्यमान देवायु, भुज्यमान नरकायु-बध्यमान मनुष्यायु, भुज्यमान देवायु-बध्यमान मनुष्यायु इस प्रकार ४ भंग हैं, वहाँ भुज्यमान मनुष्यायु-बध्यमान नरकायु, भुज्यमान नरकायु-बध्यमान मनुष्यायु, इन दोनों भंगोंमें प्रकृति समान है, इसलिए एक ही भंग ग्राह्य है तथा भुज्यमान मनुष्यायु-बध्यमान देवायु, भुज्यमान देवायु-बध्यमान मनुष्यायु इन दोनों भंगों में प्रकृति समान हैं अत: एक ही भंग ग्राह्य है, ऐसे दोभंग जानना। प्रथमपंक्तिमें अनन्तानुबन्धीके विसंयोजकजीवके अनन्तानुबन्धी ४ कषाय, तिर्यञ्चायु और अन्य कोई एकआयु इन छहप्रकृति बिना १४२ प्रकृतिरूप दूसरा सत्त्वस्थान है। जिसके मिथ्यात्वप्रकृतिका क्षय हुआ हो उसके १४१ प्रकृतिरूप तीसरास्थान, जिसने सम्यग्मिथ्यात्वका भी क्षय किया है उसके १४० प्रकृतिरूप चतुर्थस्थान, जिसके सम्यक्त्व प्रकृतिका भी क्षय हुआ है उसके १३१ प्रकृतिरूप पाँचवाँ सत्त्वस्थान है। इन चारों-स्थानों में भुज्यमानमनुष्यायु-बध्यमाननरकायु और भुज्यमानमनुष्यायु-बध्यमानदेवायुरूप दो-दो भंग हैं।
अबद्धायुष्क की प्रथमपंक्तिसम्बन्धी पाँच सत्त्वस्थानों में प्रथमस्थान १४५ प्रकृतिरूप और अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना होनेपर दूसरास्थान १४१ प्रकृतिरूप है। इन दोनों में भुज्यमाननरकायुमनुष्यायु व देवायु की अपेक्षा ३ भंग हैं तथा मिथ्यात्व का क्षय होने पर तीसरास्थान १४० प्रकृतिरूप है, यहाँ भुज्यमानमनुष्यायुरूप एक ही भंग है। मिश्रमोहनीय (सम्यग्मिथ्यात्व) प्रकृति का क्षय होने पर १३९ प्रकृतिरूप चतुर्थ-स्थान है, यहाँ भुज्यमाननरकायु मनुष्यायु और देवायु की अपेक्षा तीनभंग हैं क्योंकि तीर्थङ्करप्रकृतिकी सत्तावाला कृतकृत्यवेदकसम्यग्दृष्टिमनुष्य मरणकर नरकति या देवगति में उत्पन्न होता है, यहाँ नरक-देवमतिमें भी ऐसी सत्ता पाई जाती है। सम्यक्त्व-प्रकृति का अभाव होनेपर १३८ प्रकृतिकी सत्तारूप पाँचवाँस्थान है, यहाँ भी भुज्यमान मनुष्य-देव और नरकायु की अपेक्षा तीन भंग पाये जाते हैं तथा मनुष्यायुसहित १३८ प्रकृतिकी सत्तावाला क्षायिकसम्यग्दृष्टिजीव इसीभवमें घातियाकर्मों का नाशकरके केवली हुआ तो इस जीवके गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक न होकर तपआदि तीन ही कल्याणक होते हैं एवं जो तीसरे भवमें घातियाकर्मोंका नाशकरते हैं वे नियम से देवायुका ही बन्ध करते हैं। यहाँ देवपर्यायमें देवायुसहित १३८ प्रकृतिका सत्त्व पाया जाता है इसको आयुके छहमाह अवशेष रहने पर मनुष्यायु का बन्ध होता है और पञ्चकल्याणक भी होते हैं। जिसके मिथ्यात्वावस्था में नरकायुका बन्ध हुआ, पश्चात् सम्यग्दृष्टिहोकर तीर्थङ्करप्रकृति का बन्ध किया हो तो वह जीव नरक में उत्पन्न होता है, यहाँ नरकायुसहित १३८ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है, इसके छह मास आयु अवशिष्ट रहने पर मनुष्यायु का ही बन्ध होता है और तब इस नारकी के उपसर्ग का निवारण हो जाता है' तथा गर्भादिकल्याणक होते हैं। १. “तित्थयर संतकम्मुवसगं णिरए णिवारयति सुरा । छम्मासाउगसेसे सग्गे अमलाणमालं को ||१९५॥" त्रि.सा. जिन नारकियों के तीर्थकरनामकर्म सत्तामें है, उनकी आयुमें छ:माह शेष रहने पर देवगण उन नारकियों का उपसर्ग निवारण करदेते हैं और स्वर्ग में माला नहीं मुरझाती।