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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३४८ अर्थ- बद्धायुष्क के सप्तमसत्त्वस्थान के बाद अबद्धायुष्कापेक्षा १३६ प्रकृतिरूप ७ वा स्थान है। यहाँ जिसके देवगतिआदि दो प्रकृतियों की उद्वेलना हुई है उसके चारभंग हैं। वे इस प्रकार हैं- जैसे एकेन्द्रिय अथवा विकलत्रयजीव के देवद्विक की उद्वेलना होने पर अपनी ही पर्याय में १३६ प्रकृतिरूप स्थान होना प्रथमभंग है। वही जीव मरणकर मनुष्य में उत्पन्न हुआ वहाँ दूसराभंग हुआ । जिसके वैक्रियक-अष्टक की उद्वेलना हुई है ऐसा वही एकेन्द्रिय अथवा विकलत्रयजीव मरणकरके तिर्यञ्चपंचेन्द्रियजाति में उत्पन्न हुआ और वहाँ देवगति आदि छहप्रकृत्तियों का बन्ध करने पर भी आहारकचतुष्कआदि १० व नरकद्विक इन १२ के बिना १३६ रूप तीसरा भंग हुआ। वही जीव मरण करके मनुष्य हुआ और यहाँ पर देवगति आदि छह प्रकृतियों का बन्ध करता है, किन्तु नरकद्विकबिना १३६ प्रकृति का ही बन्ध करता है अत: यह चौथाभा जानना । विशेधा अदा की की अपेक्षा सहमसत्त्वस्थान १३६ प्रकृतिरूप है। जिसके देवद्विककी उद्वेलना हुई ऐसे एकेन्द्रिय अथवा विकलत्रय मिथ्यादृष्टि के उसी पर्याय में आहारकचतुष्क, तीर्थङ्कर, सम्यक्त्व-सम्यग्मिध्यात्वप्रकृति, देवगति-देवगत्यानुपूर्वी ये ९ और भुज्यमानतिर्यञ्चायुबिना शेष तीनआयु इन १२ प्रकृति के बिना सत्त्व १३६ प्रकृति का पाया जाता है सो एक यह भङ्ग है। जिसके देवद्विक की उद्वेलना हो गई है ऐसा वही एकेन्द्रिय या विकलत्रयमिथ्यादृष्टि मरणकर मनुष्य हुआ उसके अपर्याप्तावस्था में मिथ्यात्व होने से सुरचतुष्क का बन्ध नहीं होता अत: पूर्वोक्त १ और भुज्यमान मनुष्यायु बिना तीनआयु इस प्रकार १२ प्रकृतिबिना ५३६ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है, यह दूसराभङ्ग हुआ। जिसके वैक्रियिकशरीर-वैक्रियिक अङ्गोपांग, देवगति-देवगत्यानुपूर्वी, नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वो, वैक्रियिकशरीरबन्धन, वैक्रियिकशरीरसंघातरूप वैक्रियिकअष्टककी उद्वेलना हो गई है ऐसा वही एकेन्द्रिय या विकलत्रयजीव मरण करके पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च में उत्पन्न हुआ। यहाँ देवगति-देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर-वैक्रियिकअनोपाजा, वैक्रियिकसंघात और वैक्रियिकबन्धनरूप सुरषट्क का तो बन्ध किया और नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी का बन्ध नहीं किया। यहाँ आहारकचतुष्क, तीर्थङ्कर, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी ये ९ और भुज्यमानतिर्यञ्चायु बिना तीन आयु इसप्रकार १२ प्रकृति बिना १३६ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है, यह तृतीय भङ्ग है। वैक्रियिकअष्टक की उद्वेलना करने वाला वही एकेन्द्रिय या विकलत्रयजीव मरणकर मनुष्य में उत्पन्न हुआ वहाँ सुरषट्क का बन्ध होने से पूर्वोक्त ९ और भुज्यमानमनुष्यायुबिना तीनआयु इस प्रकार १२ प्रकृति बिना १३६ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है यह चौथा भङ्ग है। यहाँ सर्वभंगों में १३६ प्रकृति ही हैं इसलिए स्थान तो एक ही है और प्रकृति बदलने के चारप्रकार हैं अतः भंग भी चार हुए। बद्धायुष्ककी अपेक्षा अष्टमसत्त्वस्थान नारकषट्ककी उद्वेलना होने से एकेन्द्रिय या विकलेन्द्रियजीव के होता है। भुज्यमानतिर्यञ्चायु-बध्यमानमनुष्यायु के बिना देवनरकायु, आहारकचतुष्क, तीर्थकर, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, देवगति-देवगत्यानुपूर्वी, नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर,
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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